नैवं त्वमन्यथासिद्धे: शुद्धाशुद्धत्वयोर्द्वयो: ।
विरोधेप्यविरोधः स्यान्मिथः सापेक्षतः सतः ॥150॥
नासिद्धानन्यथा सिद्धिस्तद-द्वयोरेकवस्तुत: ।
यद्विशेषेपि सामान्यमेकमात्रं प्रतीयते ॥151॥
तद्यथा नव तत्त्वानि केवलं जीवपुद्गलौ ।
स्वद्रव्याद्यैरनन्यत्वाद्वस्तुतः कर्तृकर्मणो: ॥152॥
ताभ्यामन्यत्र नैतेषां किंचिद्-द्रव्यान्तरं पृथक् ।
न प्रत्येकं विशुद्धस्य जीवस्य पुद्गलस्य च ॥153॥
किन्तु सम्बन्द्धयोरेव तद्-द्वयोस्तिरेतरम् ।
नैमित्तिकनिमित्ताभ्यां भावा नव पदा अमी ॥154॥
अर्थान्नवपदीभूय जीवश्चेको विराजते ।
तदात्त्वेपि परं शुद्धस्तद्विशिष्टदशामृते ॥155॥
नासंभवं भवेदेतत्‌ तद्वि्धेरूपलब्धित: ।
सोपरक्तेरभूतार्थात्‌ सिद्धं न्‍यायाददर्शनम्‌ ॥156॥
अन्वयार्थ : [एवं तु न] ऐसा (उक्त) नहीं है [सत: शुद्धाशुद्धत्वयोर्द्वयो:] सत् की शुद्धता और अशुद्धता इन दोनों में [अनन्यथा सिद्धे:] अनन्यथा सिद्धि है (सत् की शुद्धता अशुद्धता के बिना तथा अशुद्धता शुद्धता के बिना सिद्ध ही नहीं हो सकती है) इसलिए [मिथ:] दोनों में परस्पर की [सापेक्षत:] अपेक्षा पाए जाने से [विरोधे अपि] विरोध के रहते हुए भी [अविरोध: स्यात्] कथंचित अविरोध है ।
[तद्-द्वयो: एक वस्तुत] उन दोनों अवस्थाओं में एक द्रव्य होने से (एक ही द्रव्य की पूर्वापर शुद्ध अशुद्ध दशा होने से) [अनन्यथा सिद्धि:] अनन्यथा सिद्धि [असिद्धा न] असिद्ध नहीं है [यत्] क्योंकि [विशेषे अपि] विशेष (पर्याय / अवस्था) में भी [सामान्यमेकमात्रं प्रतीयते] एकमात्र सामान्य ही प्रतीत होता है ।
[तद्यथा] पूर्वोक्त कथन का खुलासा इसप्रकार है कि [नव तत्त्वानि] ये नव तत्त्व [केवलं जीवपुद्गलौ] केवल जीव और पुद्गल रूप हैं क्योंकि [वस्तुत:] वास्तव में [स्वद्रव्याद्यै] अपने द्रव्य-क्षेत्रादि के द्वारा [अनन्यत्वात् कर्तृकर्मणो:] कर्ता और कर्म अभिन्न हैं ।
[ताभ्यामन्यत्र] उन (जीव और पुद्गलों) के सिवाय [नैतेषां किंचिद्-द्रव्यान्तरं पृथक्] इन (नव तत्त्वों में) पृथकरूप से कुछ दूसरे द्रव्य नहीं हैं तथा [न प्रत्येकं विशुद्धस्य जीवस्य पुद्गलस्य च] पृथक-पृथक विशुद्ध जीव और विशुद्ध पुद्गल के भी ये नव पदार्थ नहीं होते हैं ।
[किन्तु इतरेतर] किन्तु परस्पर [सम्बन्द्धयो एव तद्-द्वयो] सम्बन्ध के प्राप्त उन दोनों (जीव और पुद्गलों) के ही [नैमित्तिकनिमित्ताभ्यां] नैमित्तिक-निमित्त सम्बन्ध से होने वाले [भावा नव पदा अमी] भाव ये नव पदार्थ हैं ।
[अर्थात्] अर्थात् [जीवश्चेको] एक जीव ही [नवपदीभूय] (जीवाजीवादिक) नव पदार्थरूप होकर के [विराजते] विराजमान है [च] और [तदात्त्वेपि] और उन (नव पदार्थों) की अवस्था में भी [तद्विशिष्टदशाम् ऋते] यदि विशेष दशा की विवक्षा न की जावे तो [परं शुद्ध:] केवल शुद्ध जीव ही अनुभव में आता है ।
[तद्वि्धेरूपलब्धित:] उन (नव पदार्थों) में जीव को अन्वय रूप से पाए जाने के कारण [एतत्] यस उक्त कथन [नासंभवं भवेत्] असंभव नहीं है क्योंकि [सोपरक्तेरभूतार्थात्‌] सोपराक्ति के वास्तविक नहीं होने के कारण [सिद्धं न्‍यायाददर्शनम्‌] न्यायानुसार उस (उपराक्ति) की उपेक्षा हो जाती है ।