
सन्त्यनेकेत्र दृष्टान्ता हेमपद्मजलाऽनला: ।
आदर्शस्फटिकाश्मानौ बोधवारिधिसैन्धवाः ॥157॥
एकं हेम यथानेकवर्ण स्यात्परयोगत: ।
तमसन्तमिवोपेक्ष्य पश्य तद्धेम केवेलम् ॥158॥
नचाशंक्यं सतस्तस्य स्यादुपेक्षा कथं जवात् ।
सिद्धं कुतः प्रमाणाद्वा तत्सत्त्वं न कुतोपिवा ॥159॥
नानादेयं हि तद्धेम सोपरक्तेरूपाधिवत् ।
तत्त्यागे सर्वशून्यादिदोषाणां सन्निपाततः ॥160॥
न परीक्षाक्षमं चैतच्छुद्धं शुद्धं यदा तदा ।
शुद्धस्यानुपलब्धौ स्याल्लब्धिहेतोरदर्शनम् ॥161॥
यदा तद्वर्णमालायां दृश्यते हेम केवलम् ।
न दृश्यते परोपाधिः स्वेष्टं दृष्टेन हेम तत् ॥162॥
ततः सिद्धं यथा हेम परयोगाद्विना पृथक् ।
सिद्धं तद्वर्णमालायामन्ययोगेपि वस्तुतः ॥163॥
प्रक्रियेयं हि संयोज्या सर्वदृष्टान्तभूमिषु ।
साध्यार्थस्याविरोधेन साधनालंकरिष्णुषु ॥164॥
अन्वयार्थ : [हेमपद्मजलाऽनला:] सुवर्ण, कमल, जल, अग्नि [आदर्शस्फटिकाश्मानौ] दर्पण, स्फटिक पत्थर [बोधवारिधिसैन्धवाः] ज्ञान, समुद्र और नमक इसप्रकार [सन्त्यनेकेत्र दृष्टान्ता] अनेक दृष्टांत हैं ।
[एकं हेम यथा] जैसे शुद्ध स्वर्ण [स्यात्परयोगत:] अन्य धातुओं के संयोग होने पर [अनेकवर्ण] नाना वर्ण धारण करता है [तमसन्तमिव] उस परयोग को नहीं के सामान मनाकर [उपेक्ष्य पश्य] उपेक्षा करके देखा जाय तो [तद्धेम केवेलम्] वह केवल शुद्ध स्वर्ण ही है ।
[तस्य सत:] उस सत्त्वरूप पर-संयुक्त द्रव्य की [जवात्] सहसा [उपेक्षा कथं स्यात्] उपेक्षा कैसे हो जएगी ['इति' नचाशंक्यं] ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए क्योंकि [तत्सत्त्वं वाकुत प्रमाणात्] उस पर-द्रव्य का सत्व किस प्रमाण से [सिद्धं] सिद्ध होता है ? [कूट: अपि वा न] किसी भी प्रमाण से नहीं ।
[सोपरक्तेरूपाधिवत्] सोपराक्ति से उपाधि-सहित [तद्धेम] वह स्वर्ण [नानादेयं हि ] त्याज्य नहीं है क्योंकि [तत्त्यागे] उसके त्याग से [सर्वशून्यादिदोषाणां सन्निपाततः] सर्व शून्यता आदि दोषों का प्रसंग आता है ।
[एतत्] यह कथन भी [परीक्षाक्षमं न च] परीक्षा करने से सिद्ध नहीं हो सकता है कि [यदा शुद्धं] जिससमय स्वर्ण शुद्ध है [तदा शुद्धं] उस समय वह शुद्ध ही है क्योंकि [शुद्धस्यानुपलब्धौ] शुद्ध द्रव्य की प्राप्ति नहीं होने पर [लब्धिहेतो: अदर्शनम् स्यात्] उसकी प्राप्ति के हेतु का भी अदर्शन सिद्ध होता है ।
[यदा तद्वर्णमालायां] जिस समय अशुद्ध स्वर्ण के रूपों में [दृश्यते हेम केवलम्] केवल शुद्ध स्वर्ण दृष्टिगोचर किया जाता है ['तदा'] उससमय [न दृश्यते परोपाधिः] परद्रव्य की उपाधि दृष्टिगोचर नहीं होती है किन्तु [स्वेष्टं दृष्टेन हेम तत्] प्रत्यक्ष प्रमाण से अपना अभीष्ट वह केवल शुद्ध स्वर्ण ही दृष्टिगोचर होता है ।
[ततः सिद्धं] इसलिए सिद्ध हुआ कि [यथा तद्वर्णमालायामन्ययोगेपि] जैसे उस अशुद्ध स्वर्ण की वर्णमाला में अन्य धातु का संयोग होने पर भी [वस्तुत:] वास्तव में [परयोगाद्विना पृथक् हेम] परसंयोग बिना पृथक् रूप से शुद्ध स्वर्ण का अस्तित्व [सिद्धं] सिद्ध होता है ।
[अविरोधेन] बिना किसी विरोध के [साध्यार्थस्या] साध्यार्थ के साथ [साधनालंकरिष्णुषु] साधन को बताने के लिए भूषण स्वरूप [सर्वदृष्टान्तभूमिषु] सभी दृष्टान्तों में भी [इह ही प्रक्रिया] यही प्रक्रिया लगाना चाहिए ।