तोयमग्नं यथा पद्मपत्रमत्र तथा न तत्‌ ।
तदस्पृश्यस्वभावत्वादर्थतो नास्ति पत्रतः ॥165॥
सकर्दमं यथा वारि वारि पश्य न कर्दमम् ।
दृश्यते तदवस्थायां शुद्धं वारि विपङ्कवत्‌ ॥166॥
अग्निर्यथा तृणाग्नि: स्यादुपचारातृणं दहन् ।
नाग्निस्तृणं तृणं नाग्निरग्निरग्निस्तृणं तृणम्‌ ॥167॥
प्रतिबिम्बं यथादर्शे सन्निकर्षात्कलापिनः ।
तदात्वे तदवस्थायामपि तत्र कुतः शिखी ॥168॥
जपापृष्पोपयोगेन विकारः स्फटिकाश्मनि ।
अर्थात्सोपि विकारश्चाऽवास्तवस्तत्र वस्तुतः ॥169॥
ज्ञानं स्वयं धटज्ञानं परिच्छिन्दद्यथा घटम्‌ ।
नार्थाज्ज्ञानं घटोयं स्याज्ज्ञानं ज्ञानं घटो घट: ॥170॥
वारिधिः सोत्तरङ्गोऽपि वायुना प्रेरितो यथा ।
नार्थादैक्यं तदात्वेपि पारावारसमीरयोः ॥171॥
सर्वतः सैन्धवं खिल्यमर्थादेकरसं स्वयम्‌ ।
चित्रोपदंशकेषूच्चैर्यश्रानेकरसं यतः ॥172॥
इति दृष्टान्तसनाथेन स्वेष्टं दृष्टेन सिद्धिमत् ।
यत्पदानि नवामूनि वाच्यान्यर्थादवश्यतः ॥173॥
अन्वयार्थ : [यथा] जैसे [तोयमग्नं] जल में डूबा हुआ [पद्मपत्रम्] कमल का पत्ता [अत्र तथा न] जल में जलरूप से नहीं रहता [तदस्पृश्यस्वभावत्वात्] वह जल से अस्पृश्य स्वभाव वाला है इसलिए [अर्थत] वास्तव में [नास्ति पत्रतः] पत्र में जल नहीं है ।
[सकदर्मं यथा वारि] जैसे कीचड सहोत जल को [वारि पश्य न कर्दमम्] जलरूप से देखो तो कीचड लक्ष्यगत नहीं होता किन्तु [तदवस्थायां] उस (कीचड सहित) अवस्था में भी [विपङ्कवत्‌] कीचड-रहित शुद्ध जल के सामान [शुद्धं वारि दृश्यते] निर्मल जल ही दृष्टिगोचर होता है ।
[यथा] जैसे [तृणं दहन् अग्नि] तृण को जलानेवाली अग्नि [तृणाग्नि: स्यादुपचारात्] उपचार से तृण की अग्नि कही जाती है तथापि वास्तव में [नाग्निस्तृणं] अग्नि तृण नहीं होती [तृणं नाग्नि:] तृण अग्नि नहीं होता [अग्नि: अग्नि: तृणं तृणम्‌] अग्नि अग्नि होती है तृण तृण होता है ।
[यथादर्शे] जैसे दर्पण में [सन्निकर्षात्कलापिनः] मयूर के सन्निकर्ष से [प्रतिबिम्बं] प्रतिबिंब पड़ता है [तदात्वे तदवस्थायामपि तत्र] उससमय उस दर्पण में उस (प्रतिबिंबरूप) अवस्था के पाए जाने पर भी [कुतः शिखी] मयूर कहाँ है?
[अर्थात्] यथार्त में [जपापृष्पोपयोगेन] जपा-पुष्प (एक प्रकार का लाल फूल) के संयोग से [विकारः स्फटिकाश्मनि] स्फटिक-मणि में विकार (लालिमा) दिखाई देता है [स च विकार: अपि] वह विकार भी [वस्तुत:] वास्तव में [अवास्तव:] अवास्तविक है ।
[यथा] जैसे [घटम्‌ परिच्छिन्दत् ज्ञानं] घट को विषय करने वाला ज्ञान [स्वयं धटज्ञानं] स्वयं घटज्ञान कहलाता है [अर्थात्] वास्तव में [आय घट:] यह घट [ज्ञानं न] ज्ञानरूप नहीं हो जाता किन्तु [ज्ञानं ज्ञानं घट घट: स्यात्] ज्ञान ज्ञानरूप और घट घटरूप ही रहता है ।
[यथा] जैसे [वायुना प्रेरितो वारिधिः] वायु से प्रेरित समुद्र यद्यपि [सोत्तरङ्गोऽपि] तरंगित हो रहा है तथापि [तदात्वेपि] उस अवस्था में भी [पारावारसमीरयोः] समुद्र और वायु में [नार्थादैक्यं] वास्तव में एकता नहीं है ।
[यतः] जैसे [सर्वतः अर्थात्] सब अवस्थाओं में वास्तविक [एकरसं स्वयम्‌] स्वयं एकरसवाली (खारे रसवाली)) [सैन्धवं खिल्यम्] नमक की डली [उच्चै: चित्रोपदंशकेषु] उत्तम नाना प्रकार के व्यंजनों से मिलकर [अनेकरसं न] अनेक रस वाली नहीं हो जाती है ।
[इति] इसप्रकार [दृष्टान्तसनाथेन दृष्टेन] दृष्टांत पूर्वक प्रत्यक्ष प्रमाण से [यत् स्वेष्टं] जो अपना इष्ट था [तत् सिद्धिमत्] वह सिद्ध होता है [अर्थात्] वास्तव में [अमूनि नव पदानि] ये नव पद [वाच्यान्यर्थादवश्यतः] अवश्य कहना चाहिए (सम्यग्दर्शन के विषयभूत मानना चाहिए)