
कैश्चित्तु कल्प्यते मोहाद्वक्तव्यानि पदानि न ।
हेयानीति यतस्तेभ्यः शुद्धमन्यत्र सर्वतः ॥174॥
तदसत् सर्वतस्त्यागः स्यादसिद्धः प्रमाणतः ।
तथा तेभ्योऽतिरिक्तस्य शुद्धस्यानुपलब्धितः ॥174॥
नावश्यं वाच्यता सिद्धयेत् सर्वतो हेयवस्तुनि ।
नान्धकारेऽप्रविष्टस्य प्रकाशानुभयो मनाक् ॥176॥
नावाच्यता पदार्थानां स्यादकिंचित्करत्वतः ।
सार्थानीति यतोऽवश्यं वक्तव्यानि नवार्थतः ॥177॥
न स्यात्तेभ्योऽतिरिक्तस्य सिद्धिः शुद्धस्य सर्वतः ।
साधनाभावतस्तस्य तद्यथानुपलब्धितः ॥178॥
अन्वयार्थ : [कैश्चित् तु] किन्हीं लोगों के द्वारा [मोहात्] मोह से [कल्प्यते] कल्पित किया गया [हेयानि पदानि वक्तव्यानि न] व्यक्त पद हेय है इसलिए उन्हे नहीं कहना चाहिए [इति] ऐसा [यतस्तेभ्यः शुद्धमन्यत्र सर्वतः] क्योंकि उन सब पदार्थों से अतिरिक्त शुद्ध द्रव्य है ।
[तदसत्] उक्त कथन ठीक नहीं है क्योंकि [सर्वतस्त्यागः] उनका सर्वथा त्याग [स्यादसिद्धः प्रमाणतः] प्रमाण से असिद्ध है [तथा तेभ्योऽतिरिक्तस्य] तथा उन के बिना [शुद्धस्यानुपलब्धितः] शुद्ध की उपलब्धि नहीं है ।
[सर्वतो हेयवस्तुनि] सर्वथा हेय वस्तु में [नावश्यं वाच्यता सिद्धयेत्] वाच्यता अवश्य सिद्ध नहीं हो सकती क्योंकि [नान्धकारेऽप्रविष्टस्य] अन्धकार में प्रवेश न करने वाले को [प्रकाशानुभयो मनाक्] कुछ भी प्रकाश का अनुभव नहीं होता है ।
[यत:] क्योंकि [अर्थत:] प्रयोजनवश [सार्थानि नव अवश्यं वक्तव्यानि] प्रयोजनभूत नव पदार्थ अवश्य व्यक्त हैं [इति] इसलिए [अकिंचित्करत्वतः] अकिंचितकर हेतु से [पदार्थानां अवाच्यता न स्यात्] पदार्थ में अवाच्यता सिद्ध नहीं होती ।
[तेभ्य: अतिरिक्तस्य शुद्धस्य सर्वतः] उन से अतिरिक्त सर्वथा शुद्ध द्रव्य की [न स्यात्तेभ्योसिद्धिः] सिद्धि नहीं हो सकती क्योंकि [साधनाभावत:] साधन का अभाव होने पर [तस्य] उस की [तद्यथानुपलब्धितः] उपलब्धि नहीं हो सकती जैसा कि आगे से प्रकट होता है ।