
ननु चार्थान्तरं तेभ्य: शुद्धं सम्यक्त्वगोचरम् ।
अस्ति जीवस्य स्वं रूपं नित्योद्योतं निरामयम् ॥179॥
न पश्यति जगाद्यावन्मिथ्यान्धतमसा ततम् ।
अस्तमिथ्यान्धकारं चेत् पश्यतीदं जगज्जवात् ॥180॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंकाकार का कहना है कि [चार्थान्तरं तेभ्य:] उन से सवथा भिन्न [शुद्धं सम्यक्त्वगोचरम्] शुद्ध सम्यग्दर्शन का विषयभूत [नित्योद्योतं निरामयम्] नित्य प्रकाशमान आधिव्याधि रहित [अस्ति जीवस्य स्वं रूपं] जीव का शुद्ध स्वरूप है किन्तु [जगत्] लोग [यावत्] जब तक [मिथ्यान्धतमसा ततम्] मिथ्यात्व रुपी गाढ अन्धकार से व्याप्त रहते हैं [तावत्] तब तक [न पश्यति] नहीं देखते हैं और जिस समय [जगत्] लोग [अस्तमिथ्यान्धकारं चेत्] मिथ्यात्व रुपी अन्धकार से रहित होते हैं उस समय [पश्यतीदं जवात्] तत्काल वे उसे को देखने लगते हैं ।