नैवं विरुद्धधर्मत्वाच्छुद्धाशुद्धत्वयोर्द्वयो: ।
नैकस्येकपदे द्वे स्तः शुद्धाशुद्धे क्रियेऽर्थतः ॥181॥
अथ सत्यां हि शुद्धायां क्रियायामर्थतश्चितः ।
स्यादशुद्धा कथं वा चेदस्ति नित्या कथं न सा ॥182॥
अन्वयार्थ : [एवं न] ऐसा नहीं है क्योंकि [शुद्धाशुद्धत्वयोर्द्वयो:] उन शुद्ध और असुद्ध दोनों द्रव्यों को [विरुद्धधर्मत्वात्] परस्पर विरुद्ध धर्म होने से [अर्थत:] वास्तव में [एकस्येकपदे] एक द्रव्य के एक पदरूप पर्याय में [न द्वे स्तः शुद्धाशुद्धे क्रिये] शुद्ध और अशुद्ध दोनों क्रियाएं एक साथ नहीं हो सकतीं ।
[अथ] अब उक्त कथन का खुलासा करते है कि [अर्थतः] वास्तव में [चितः] आत्मा की [शुद्धायां क्रियायां सत्यां] शुद्ध क्रिया होने पर [अशद्धा कथं वा स्यात्‌] अशुद्ध क्रिया कैसे होगी [अस्ति चेत्‌] यदि होगी तो [हि] निश्चय से [सा नित्या कथं न स्यात्‌] वह अशुद्ध क्रिया नित्य क्यों नहीं होगी ।