
अथ सत्यामशुद्धायां बन्धाभावो विरुद्धभाक् ।
नित्यायामथ तस्यां हि सत्यां मुक्तेरसम्भवः ॥183 ॥
ततः सिद्धं यदा येन भावेनात्मा समन्वित: ।
तदानन्यगतिस्तेन भावेनात्मास्ति तन्मयः ॥184॥
तस्माच्छुभ: शुभेनैव स्यादशुभोऽशुभेन यः ।
शुद्धः शुद्धेन भावेन तदात्वे तन्मयत्वतः ॥185॥
ततोऽनर्थान्तरं तेभ्यः किन्चिच्छुद्धमनीदृशम् ।
शुद्ध: नव पदान्येव तद्विकारादृते परम् ॥186॥
अतस्तत्त्वार्थश्रद्धानं सूत्रे सद्दर्शनं मतम् ।
तत्तत्त्वं नव जीवाद्या यथोदेश्या: क्रमादपि ॥187॥
अन्वयार्थ : [अथ] तथा [सत्यामशुद्धायां] अशुद्ध क्रिया के रहने पर [बन्धाभावो विरुद्धभाक्] बांध का अभाव मानना बाधित हो जाएगा [नित्यायामथ तस्यां सत्यां] और उस अशुद्ध क्रिया के नित्य सिद्ध होने पर [हि] निश्चय से [मुक्तेरसम्भवः] मुक्ति असंभव होगी ।
[ततः सिद्धं] इसलिए सिद्ध होता है कि [यदा येन भावेनात्मा समन्वित:] जिससमय आत्मा जिस भाव से युक्त होता है [तदा] उस समय [तेन भावेन] उसी भाव से [अनन्यगति] अनन्य होकर [भावेनात्मास्ति तन्मयः] आत्मा उसी भावमय होता है ।
[तस्मात्] इसलिए [तदात्वे तन्मयत्वतः] उस समय उसी भाव रूप परिणत होने से [अशुभ शुभेनैव] अशुभ और शुभ भाव से ही [स्यादशुभोऽशुभेन यः] शुभ-अशुभ होता है [शुद्धः शुद्धेन भावेन] शुद्ध भाव से शुद्ध होता है ।
[तत:] इसलिए [तेभ्यः] उन से [किन्चिच्छुद्धमनीदृशम्] सुद्ध तत्त्व कुछ विलक्ष्ण [अनर्थान्तरं] अर्थान्तर नहीं है [तद्विकारादृते परम्] केवल उन सम्बन्धी विकारों को छोड़कर [शुद्ध: नव पदान्येव] नव तत्त्व भी शुद्ध हैं ।
[अत:] इसलिए [तत्त्वार्थश्रद्धानं सूत्रे] सूत्र में तत्त्वार्थ का श्रद्धान को [सद्दर्शनं मतम्] सम्यग्दर्शन माना है [तत्तत्त्वं नव जीवाद्या] वे तत्त्व भी जीवाजीवादि से नव हैं अत: [यथोदेश्या: क्रमादपि] क्रमानुसार उन का कथन करना चाहिए ।