तदुद्देश्यो यथा जीवः स्यादजीवस्तथास्रवः ।
बन्धः स्यात्संवरश्चापि निर्जरा मोक्ष इत्यपि ॥188॥
सप्तैते पुण्यपापाभ्यां पदार्थास्ते नव स्मृता: ।
सन्ति सद्दर्शनस्योच्चैर्विषया भूतार्थमाश्रिता: ॥189॥
तत्राधिजीवमाख्यानं विदधाति यथाधुना ।
कविः पूर्वापरायत्तपर्यालोचविचक्षणः ॥190॥
जीवसिद्धि: सती साध्या सिद्धा साधीयसी पुरा ।
तत्सिद्धलक्षणं वक्ष्ये साक्षात्तल्लब्धिसिद्धये ॥191॥
अन्वयार्थ : [तदुद्देश्यो यथा] उनका निर्देश (नाममात्र कथन) इसप्रकार है कि [जीवः स्यादजीवस्तथास्रवः] जीव, अजीव और आस्रव [बन्धः स्यात्संवरश्चापि निर्जरा मोक्ष इत्यपि] बाध तथा संवर, निर्जरा और मोक्ष ।
[सप्तैते] ये सात और [पुण्यपापाभ्यां] पुण्य और पाप [पदार्थास्ते नव स्मृता:] को नौ पदार्थ जानों; [भूतार्थमाश्रिता:] यथार्थता (सत्यार्थता / भूतार्थ-नय) से देखने पर [सन्ति सद्दर्शनस्योच्चैर्विषया] सम्यग्दर्शन के वास्तविक विषय हैं ।
[तत्र] उन (तत्त्वों) में से [यथाधुना] अब [कविः पूर्वापरायत्तपर्यालोचविचक्षणः] पूर्वापर सम्बन्ध पूर्वक पर्यालोचन करने वाला कवि [अधिजीवम् आख्यानं] जीव का व्याख्यान [विदधाति] करता है ।
[पुरा] पहले [सती सिद्धा] भले प्रकार सिद्ध की गई [जीवसिद्धि:] जीव की सिद्धि [साध्या साधीयसी] अत्यंत विशदरूप से सिद्ध करना है [साक्षात्तल्लब्धिसिद्धये] साक्षात जीव की उपलब्धि के लिए [तत्सिद्धलक्षणं वक्ष्ये] उसका प्रसिद्ध लक्षण कहता हूँ ।