
सत्यं शुद्धास्ति सम्यक्त्वे सैवाशुद्धास्ति तद्विना ।
असत्यबन्धफला तत्र सैव बन्धफलान्यथा ॥217॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है, उत्तर इस प्रकार है कि आत्मोपलब्धि सम्यक्त्व के सद्भाव में शुद्ध है और सम्यक्त्व के बिना वही अशुद्ध है, अतः सम्यक्त्व के सद्भाव में वह बन्ध फलवाली नहीं है किन्तु सम्यक्त्व के अभाव में वह बन्धफलवाली अवश्य है ॥२१७॥