ननु सद्दर्शनं शुद्धं स्यादशुद्धा मृषा रुचि: ।
तत्कथं विषयश्चैकः शुद्धाशुद्धविशेषभाक्‌ ॥218॥
यद्वा नवसु तत्त्वेषु चास्ति सम्यग्दगात्मनः ।
आत्मोपलब्धिमात्रं वै सा चेच्छुद्धा कुतो नव ॥219॥
अन्वयार्थ : माना कि सम्यग्दर्शन शुद्ध है ओर मिथ्यादर्शन अशुद्ध है पर इनका विषय एक होने से उसके शुद्ध और अशुद्ध ऐसे भेद कैसे हो सकते हैं ? अथवा सम्यग्दृष्टि के नौ पदार्थों में से केवल आत्मा की उपलब्धि होती है और यदि वह शुद्ध है तो सम्यग्दर्शन के विषय नौ पदार्थ कैसे हो सकते हैं ?