
नैवं यतः स्वतः शश्वत् स्वादुभेदोऽस्ति वस्तुनि ।
तत्राभिव्यञ्जकद्वेधाभावसद्भावतः प्रथक् ॥220॥
शुद्धं सामान्यमात्रत्वादशुद्धं तद्विशेषतः ।
वस्तु सामान्यरूपेण स्वदते स्वादुसद्विदाम् ॥221॥
स्वदते न परेषां तद्यद्विशेषेऽप्यनीदृशम् ।
तेषामलब्धबुद्धित्वाद् दृष्टेर्दृङ्मोहदोषतः ॥222॥
यद्वा विशेषरूपेण स्वदते तत्कुदृश्टिनाम् ।
अर्थात् सा चेतना नूनं कर्मकार्येऽथ कर्मणि ॥223॥
दृष्टान्तः सैन्धवं खिल्यं व्यञ्जनेषु विमिश्रितम् ।
व्यञ्जनं चारमज्ञानां स्वदते तद्विमोहिनाम् ॥224॥
क्षारं खिल्यं तदेवैकं मिश्रितं व्यञ्जनेषु वा ।
न मिश्रितं तदेवैकं स्वदते ज्ञानवेदिनाम् ॥225॥
इति सिद्धं कुदृष्टिनामेकैवाज्ञानचेतना ।
सर्वैर्भावैस्तदज्ञानजातैस्तैरनतिक्रमात् ॥226॥
सिद्धमेतावता यावच्छुद्धोपलब्धिरात्मनः ।
सम्यक्त्वं तावदेवास्ति तावती ज्ञानचेतना ॥227॥
अन्वयार्थ : ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि के सदा ही वस्तु में स्वभावतः स्वादभेद पाया जाता है । कारण कि उनके स्वादभेद के अभिव्यंजक जुदे-जुदे दो प्रकार के होते हैं । मिथ्यादृष्टि के ऐसे भाव होते हैं जिससे उन्हें भिन्न प्रकार का स्वाद आता है और सम्यग्दृष्टि के ऐसे भाव होते हैं जिससे उन्हें भिन्न प्रकार का स्वाद आता है ॥२२०॥
सामान्यरूप से वस्तु शुद्ध होती है और अपने भेदों की अपेक्षा से वह अशुद्ध होती है । यही कारण है कि सम्यग्दृष्टियों को सामान्य रूप से ही वस्तु का स्वाद् आता है ॥२२१॥
किन्तु मिथ्यादृष्टियों को ऐसी सामान्य वस्तु का स्वाद नहीं आता जो विशेष अवस्था के होने पर एक सा बना रहता है, क्योंकि उनका सम्यग्दर्शन दर्शन-मोहनीय के उदय से दूषित रहता है इसलिए उनके ज्ञान-चेतना का ग्रहण नहीं होता है ॥२२२॥
अथवा मिथ्यादृष्टियों को विशेषरूप से वस्तु का स्वाद आता है । अर्थात् मिथ्यादृष्टियों की चेतना निश्चय से कर्मफल में या कर्म में ही होती है ॥२२३॥
उदाहरणार्थ भोजन में नमक की डली मिला देने पर भोजन के लोलुपी अज्ञानी जनों को भोजन ही खारा लगता है ॥२२४॥
किन्तु ज्ञानी पुरुषों को भोजन में मिली हुई या भोजन में नहीं मिली हुई केवल एक नमक को डली ही खारी लगती है । वे खारापन एक नमक का ही स्वाद मानते हैं ॥२२५॥
इस प्रकार सिद्ध होता है कि मिथ्यादृष्टियों के एक अज्ञान-चेतना ही होती है, क्योंकि उनके सब भाव केवल अज्ञानजन्य होते हैं । अज्ञान के बाहर उनके कोई भाव नहीं पाया जाता ॥२२६॥
इसलिये इस कथन से यह सिद्ध होता है कि जबतक आत्मा की शुद्धोपलब्धि होती है तब तक ही सम्यकत्व रहता है और ज्ञान-चेतना भी तभी तक पाई जाती है ॥२२७॥