
एकः सम्यग्दृगात्माऽसौ केवलं ज्ञानवानिह ।
ततो मिथ्यादृशः सर्वे नित्यमज्ञानिनो मताः ॥228॥
क्रिया साधारणी वृत्तिर्ज्ञानिनोऽज्ञानिनस्तथा ।
अज्ञानिनः क्रिया बन्धहेतुर्न ज्ञानिन: क्वचित् ॥229॥
आस्तां न बन्धहेतुः स्याज्ज्ञानिनां कर्मजा क्रिया ।
चित्रं यत्पूर्वबद्धानां निजरायै च कर्मणाम् ॥230॥
जस्माज्ज्ञानमया भावा ज्ञानिनां ज्ञाननिर्वृताः ।
अज्ञानमयभावानां नावकाशः सुदृष्टिसु ॥231॥
अन्वयार्थ : इस संसार में केवल एक सम्यग्दृष्टि आत्मा ही ज्ञानी है इसलिये जितने भी मिथ्यादृष्टि जीव हैं वे सदा अज्ञानी माने गये हैं ॥२२८॥
ज्ञानी और अज्ञानी की क्रिया के फल में भेद
ज्ञानी ओर अज्ञानी की क्रिया यद्यपि एक समान होती है तथापि अज्ञानी की क्रिया बंध का कारण है किन्तु ज्ञानी की क्रिया कहीं भी बन्ध का कारण नहीं है ॥२२६॥
ज्ञानियों की कर्म-जन्य क्रिया बंध का कारण नहीं है यह तो सुनिश्चित है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं । परन्तु आश्चर्य तो यह है कि उनकी क्रिया पू्र्वबद्ध कर्मों की निर्जरा का भी कारण है ॥२३०॥
ऐसा होने का कारण यह है कि ज्ञानियों के जितने भी भाव होते हैं, वे ज्ञान-निमित्तक ही होते हैं इसलिये वे ज्ञानमय ही होते हैं । सम्यग्दष्टियों के अज्ञानमय भावों के पाये जाने के लिए थोड़ा भी अवकाश नहीं है ॥२३१॥