
वैराग्यं परमोपेक्षाज्ञानं स्वानुभवः स्वयम् ।
तद्-द्वयं ज्ञानिनो लक्ष्म जीवन्मुक्तः स एव च ॥232॥
ज्ञानी ज्ञानैकपात्रत्वात् पश्यत्यात्मानमात्मवित् ।
बद्धस्पृष्टादिभावानामस्वरूपादनास्पदम् ॥233॥
ततः स्वादु यथाध्यक्षं स्वमासादयति स्फुटम् ।
अविशिष्टमसंयुक्त नियतं स्वमनन्यकम् ॥234॥
अथाबद्धमथास्पष्टं शुद्धं सिद्धपदोपमम् ।
शुद्धस्फटिकसंकासं निःसंगं व्योमवत् सदा ॥235॥
इन्द्रियोपेक्षितानन्तज्ञानदृग्वीर्यमूर्तिकम् ।
अक्षातीतसुखानन्तस्वाभाविकगुणान्वितम् ॥236॥
पश्यन्निति निजात्मानं ज्ञानी ज्ञानैकमूर्तिमान् ।
प्रसङ्गादपरं चैच्छेदर्थात् सार्थ कृतार्थवत् ॥237॥
अन्वयार्थ : परम उपेक्षारूप वैराग्य और स्वयं स्वानुभवरूप ज्ञान ये दो ही ज्ञानी के लक्षण हैं । जिसके ये लक्षण पाये जाते हैं वह ही जीवन्मुक्त है ॥२३२॥
यह एकमात्र ज्ञान का पात्र होने से ज्ञानी है और आत्मवित् है इसलिये अपने आत्मा को देखता है । तथा बद्ध और स्पृष्ट आदि भाव भी इसके स्वरूप नहीं होने से यह इनका भी स्थान नहीं है ॥२३३॥
इसलिये जैसा उसके अनुभव में आता है तदनुसार वह अपने को अविशिष्ट, संयोग-रहित, नियत और अन्य से भिन्न पाता है ॥२३४॥
ज्ञानी ज्ञान की ही एक मूर्ति है । वह अपनी आत्मा को इसप्रकार देखता है कि वह बन्ध से रहित है,अस्पृपष्ट है, शुद्ध है, सिद्धों के समान है, शुद्ध स्फटिक के समान निर्मल है, आकाश के समान निःसंग है, अतिन्द्रिय अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन और अनन्त वीर्य की मूर्ति है, तथा अतीन्द्रिय सुख और अनन्त स्वाभाविक गुणों से युक्त है । यद्यपि वह अपने को ऐसा अनुभव करता है तो भी वह
प्रसंगवश कृतकृत्य के समान परम उपेक्षा भाव से अन्य पदार्थ को भी चाहता है ॥२३५-२३७॥