ऐहिक यत्सुखं नाम सर्व वैषयिकं स्मृतम्‌ ।
न तत्सुखं सुखाभासं किन्तु दुःखमसंशयम्‌ ॥238॥
तस्माद्वेयं सुखाभासं दुःखं दुःखफलं यतः ।
हेयं तत्कर्म यद्धेतुस्तस्यानिष्टस्य सर्वतः ॥239॥
तत्सर्वं स्वतः कर्म पौद्गलिकं तदष्टधा ।
वैपरीत्यात्फलं तस्य सर्वं दुखं विपच्यतः ॥240॥
चतुर्गतिभवावर्ते नित्यं कर्मैकहेतुके ।
न पदस्थो जनः कश्चित्‌ किन्तु कर्मपदस्थितः ॥241॥
स्वस्वरुपाच्च्युतो जीवः स्यादलब्धस्वरूपवान् ।
नानादुःखसमाकीर्णे संसारे पर्यटन्निति ॥242॥
अन्वयार्थ : जो ऐहिक सुख है वह सब वैषयिक माना गया है । वह सुख नहीं है किन्तु सुखाभास है । निश्चय से वह दुःख ही है ॥२३८॥
इसलिये यह सुखाभास होने से छोड़ने योग्य है, क्योंकि यह स्वयं दु:खरूप है और इसका फल भी दुःख है । तथा वह कर्म भी सब प्रकार से छोड़ने योग्य है जो इस अनिष्टकारी सुखाभास का कारण है ॥२२६॥ यह सब कर्म सर्वतः पौद्गलिक है और वह आठ प्रकार का है । विपरीतता के कारण उदय को प्राप्त हुए उसका फल सब प्रकार का दुःख ही है ॥२४०॥ यह चार गतिरूप संसार चक्र कर्मोदय के कारण होता है । इसमें कोई भी जीव अपने पद में स्थित नहीं है किन्तु कर्म-पद में स्थित है । आशय यह है कि जो इस संसार चक्र में घूम रहा है वह अपने स्वरूप से च्युत है और कर्मोदय निमित्तक अवस्थाओं को अपनी मान रहा है ॥२४१॥
इस प्रकार नाना दुखों से व्याप्त इस संसार में घूमता हुआ यह जीव अपने स्वरूप से च्युत हो रहा है । अर्थात्‌ कभी भी इसने
अपने स्वरूप को प्राप्त नहीं किया है ॥२४२॥