
सत्यमेतादृशो यावज्जघन्यं पदमाश्रितः ।
चारित्रावरणं कर्म जघन्यपदकारणम् ॥267॥
तदर्थेषु रतो जीवश्चारित्रावरणोदयात् ।
तद्विना सर्वतः शुद्धो वीतरागोस्त्यतीन्द्रियः ॥268॥
दृग्मोहस्य क्षतेस्तस्य नूनं भोगाननिच्छतः ।
हेतुसद्भावतोऽवश्यमुपभोगक्रिया बलात् ॥269॥
नासिद्धं तद्विरागत्वं क्रियामात्रस्य दर्शनात् ।
जंगतोऽनिच्छतोऽप्यस्ति दारिद्रयं मरणादि च ॥270॥
व्यापीडितो जनः कश्चित्कुर्वाणो रुक्प्रतिक्रियाम् ।
तदात्वे रुक्पदं नेच्छेत् का कथा रुक्पुनर्भवे ॥271॥
कर्मणा पीडितो ज्ञानी कुर्वाणः कर्मजां क्रियाम् ।
नेच्छेत् कर्मपदं किञ्चित् साभिलाष: कुतो नयात् ॥272॥
नासिद्धोऽनिच्छतस्तस्य कर्म तस्यामयात्मनः ।
वेदनायाः प्रतीकारो न स्याद्भोगादिहेतुकः ॥273॥
सम्यग्दृष्टिरसौ भोगान् सेवमानोऽप्यसेवकः ।
नीरागस्य न रागाय कर्माऽकामकृतं यतः ॥274॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है, क्योंकि जब तक वह जघन्य पद में रहता है तब तक यह अवस्था होती है । और इस जधन्य पद का कारण चारित्रावरण कर्म है ॥२६७॥
ऐसा नियम है कि यह जीव चारित्र मोहनीय कर्म के उदय से इन्द्रियों के विषयों में रत होता है । किन्तु चारित्र मोहनीय के बिना यह सर्वथा शुद्ध, वीतराग और अतीन्द्रिय हो जाता है ॥२६८॥
यद्यपि दर्शन मोहनीय का क्षय हो जाने से सम्यग्दृष्टि जीव भोगों की इच्छा नहीं करता तथापि हेतु का सद्भाव रहने से इसके भोग क्रिया अवश्य होती है ॥२६९॥
यदि कहा जाय कि इसके क्रिया देखी जाती है इसलिये वीतरागता असिद्ध है सो भी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार बिना चाहे जग को दारिद्र और मरण आदि की प्राप्ति होती है उसी प्रकार सम्यन्दृष्टि के बिना इच्छा के विषयों में प्रवृत्ति देखी जाती है ॥२७०॥
जिस प्रकार रोग से पीड़ित हुआ कोई मनुष्य रोग का प्रतीकार करता है ओर उस अवस्था के प्राप्त होने पर रोगी भी नहीं रहना चाहता है । तो फिर दुबारा रोग के उत्पन्न होने की कथा ही कैसे की जा सकती है ॥२७१॥
उसी प्रकार कर्म से पीडित हुआ ज्ञानी पुरुष कर्म-जन्य क्रिया को करता हुआ भी किसी कर्मपद को नहीं चाहता तो फिर वह उसमें अमिलाषा साइत किस न्याय से हो सकता है ? ॥२७२॥
और कर्म को नहीं चाहनेवाले उसके वेदना का प्रतीकार असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि जब वह रोगी है तो वेदना का प्रतीकार अवश्य होगा। हाँ इतनी बात अवश्य है कि वह नूतन रोगादि का कारण नहीं होगा॥ २७३॥
सम्यस्दष्टि जीव भोगों का सेवन करता हुआ भी उनका सेवन करनेवाला नहीं होता, क्योंकि राग-रहित जीव का अनिच्छा से किया गया कर्म राग का कारण नहीं होता ॥२७४॥