
अस्ति तस्यापि सद्-दृष्टे: कस्यचित् कर्मचेतना ।
अपि कमफले सा स्यादर्थतो ज्ञानचेतना ॥275॥
चेतनायाः फलं बन्धस्तत्फले वाथ कर्मणि ।
रागाभावान्न बन्धोऽस्य तस्मात् सा ज्ञानचेतना ॥276॥
अस्ति ज्ञानं यथा सौख्यमेन्द्रियं चाप्यतीन्द्रियम् ।
आद्यं द्वयमनादेयं समादेयं परं द्वयम् ॥277॥
नूनं यत्परतो ज्ञानं प्रत्यर्थं परिणामि यत् ।
व्याकुलं मोहसंपृक्तमर्थाद् दु:खमनर्थवत् ॥278॥
सिद्धं दुःखत्वमस्योच्चै: व्याकुलत्वोपलब्धितः
ज्ञातशेषार्थसद्भावे तद्बुभुत्सादिदर्शनात् ॥279॥
अन्वयार्थ : यद्यपि किसी सम्यग्दृष्टि के कर्म-चेतना और कर्म-फल-चेतना होती है । पर वास्तव में वह ज्ञान-चेतना ही है ॥२७५॥
कर्म-चेतना और कर्म-फल-चेतना का फल बन्ध माना गया है । पर इस सम्यग्दृष्टि के राग का अभाव हो जाने से बन्ध नहीं होता, इसलिये वह ज्ञान-चेतना ही है ॥२७६॥
जिस प्रकार इन्द्रियजन्य सुख और अतीन्द्रिय सुख होता है इसी प्रकार ज्ञान भी दो प्रकार का होता है । इसमें से प्रारम्भ के दो हेय हैं और अन्त के दो उपादेय हैं, ॥२७७॥
जो ज्ञान पर के निमित्त से होता है, प्रत्येक पदार्थ को क्रम से जानता है, व्याकुल है और मोहयुक्त है वह वास्तव में दुःखरूप और अनर्थकारी ही है ॥२७८॥
व्याकुलता पाई जाने के कारण यह ज्ञान दुःखरूप है यह बात अच्छी तरह से सिद्ध होती है । तथा जाने हुए पदार्थों के सिवा बहुत से पदार्थ शेष रहते हैं जिनके जानने की उत्कट इच्छा आदि देखी जाती है, इसलिये यह ज्ञान व्याकुलतामय है यह, भी सिद्ध होता हे ॥२७९॥