
तत्रापि सन्निधानत्वे सन्निकर्षेषु सत्सु च ।
तत्राप्यवग्रहेहादौ ज्ञानस्यास्तिक्यदर्शनात् ॥288॥
समस्तेषु न व्यस्तेषु हेतुभूतेषु सत्स्वपि ।
कदाचिज्जायते ज्ञानमुपर्युपरि शुद्धितः ॥289॥
तद्यथा मतिज्ञानस्य श्रुतज्ञानस्य वा सतः ।
आलापाः सन्त्यसंख्यातास्तत्रानन्ताश्च शक्तयः ॥290॥
तेषामावरणान्युच्चैरालापाच्छक्तितोऽथवा ।
प्रत्येकं सन्ति तावन्ति सन्तानस्यानतिक्रमात् ॥291॥
तत्रालापस्य यस्योच्चैर्यावदंशस्य कर्मण: ।
क्षायोपशमिकं नाम स्यादवस्थान्तरं स्वतः ॥292॥
अपि वीर्यान्तरायस्य लब्धिरित्यभिधीयते ।
तदैवास्ति स आलापस्तावदंशश्च शक्तित: ॥293॥
उपयोगविवक्षायां हेतुरस्यास्ति तद्यथा ।
अस्ति पञ्चेन्द्रियं कर्म कर्म स्यान्मानसं तथा ॥294॥
दैवात्तद्वन्धमायाति कथञ्चित् कस्यचित् क्वचित् ।
अस्ति तस्यौदयस्तावन्न स्यात् संक्रमणादि चेत् ॥295॥
अन्वयार्थ : वर्तमान कालीन पदार्थों में भी जो सन्निकट हैं और योग्य सन्निकर्ष को प्राप्त हैं उनमें ही इसकी प्रवृत्ति होती है । उसमें भी अवग्रह और ईहा आदि के होने पर ही इस ज्ञान का अस्तित्व देखा जाता है ॥२८८॥
इस प्रकार इन समस्त कारणों के रहने पर उत्तरोत्तर शुद्धि के होने से ही कदाचित् यह ज्ञान उत्पन्न होता है । यदि ये कारण अलग अलग रहें तो यह ज्ञान नहीं उत्पन्न होता ॥२८९॥
उक्त कथन का खुलासा इस प्रकार है -- मतिज्ञान और श्रुतज्ञान के असंख्यात भेद हैं और उनकी अनन्त शक्तियां हैं ॥२९०॥
तथा इनके भेद और शक्तियां जितनी हैं उतने ही इनके आवरण करनेवाले कर्म हैं, क्योंकि ये अपनी अपनी सन्तान को उल्लंघन नहीं करते ॥२९१॥
उनमें से कर्म के जिस भेद के जिस अंश का स्वतः अवस्थान्तर अर्थात क्षयोपशम होता है उतना क्षायोपशमिक ज्ञान कहलाता है ॥२९२॥
और वीर्यान्तराय का क्षयोपशम लब्धि कहलाता है; उस समय इसका भी वही भेद और वही शक्त्यंश उदित होता है ॥२९३॥
इसके सिवा इस ज्ञान के उपयुक्त होने में पांच इन्द्रिय नामकर्म और मानस नामकर्म भी हेतु हैं ॥२९४॥
ये कर्म दैववश किसी जीव के किसी अवस्था में किसी प्रकार बन्ध को प्राप्त होते हैं । उसमें भी यदि संक्रमण आदि नहीं हो गया हो तो जीव के इनका उदय होता है ॥२९५॥