अथ तस्योदये हेतुरस्ति हेत्वन्तरं यथा ।
पर्याप्तं कर्म नामेति स्थादवश्यं सहोदयात्‌ ॥296॥
सति तत्रोदये सिद्धाः स्वतो नोकर्मवर्गणाः ।
मनोदेहेन्द्रियाकारं जायते तन्निमित्ततः ॥297॥
तेषां परिसमाप्तिश्चेज्जायते दैवयोगतः ।
लब्धेः स्वर्थोपयोगेषु बाह्यं हेतुर्जडेन्द्रियम्‌ ॥298॥
अस्ति तत्रापि हेतुर्वा प्रकाशो रविदीपयो: ।
अन्यदेशस्थसंस्कारः पारंपर्यावलोकनम्‌ ॥299॥
एतेषु हेतुभूतेषु सत्सु सद्भानसम्भवात्‌ ।
रूपेणैकेन हीनेषु ज्ञानं नार्थोपयोगि तत्‌ ॥300॥
अस्ति तत्र विशेषोऽयं बिना बाह्येन हेतुना ।
ज्ञानं नार्थोपयोगीति लब्धिज्ञानस्य दर्शनात् ॥301॥
देशतः सर्वतो घातिस्पर्धकानामिहोदयात्‌ ।
क्षायोपशमिकावस्था न चेज्ज्ञानं न लब्घिमत्‌ ॥302॥
ततः प्रकृतार्थमेवैतद्दिङ्मात्रं ज्ञानमैन्द्रियम् ।
तदर्थार्थस्य सर्वस्य देशमात्रस्य दर्शनात् ॥303॥
खण्डितं खण्डशस्‍तेषामेकार्थस्य कर्षणात्‌ ।
प्रत्येकं नियतार्थस्य व्यस्तमात्रे सति क्रमात्‌ ॥304॥
अन्वयार्थ : इस कर्म का उदय होने पर इन्द्रिय ज्ञान की उत्पत्ति में एक दूसरा हतु और है जो पर्याप्त नामकर्म है । उक्त कर्मों
के साथ इसका उदय होने से इन्द्रियज्ञान अवश्य होता है ॥२९६॥
इस पर्याप्त नामकर्म का उदय होने पर स्वयं-सिद्ध नोकर्म-वर्गणाएं उस पर्याप्त नामकर्म के निमित्त से मन, शरीर और इन्द्रियों के आकाररूप से परिणित हो जाती हैं ॥२९७॥
यदि दैववश उन मन, शरीर और इन्द्रियों की पूर्णता हो जाय तो जड़ इन्द्रियां लब्धि के अपने विषय के प्रति उपयुक्त होने में बाह्य कारण हो जाती हैं ॥२९८॥
इतने पर भी सूर्य और दीपक का प्रकाश, अन्य देशस्थ संस्कार और परंपरावलोकन, ये भी ज्ञान की उत्पत्ति में कारण हैं ॥२९९॥
इतने हेतुओं के रहने पर ही समीचीन ज्ञान होना सम्भव है । यदि इनमें से एक भी कारण कम हो जाय तो वह ज्ञान पदार्थों को नहीं जान सकता है ॥३००॥
इसमें भी इतनी विशेषता है कि बाह्य कारण के बिना ज्ञान पदार्थों को नहीं जानता तब केवल लब्धिज्ञान देखा जाता है ॥१०१॥
यहां यदि देशघाति और सर्वघाति दोनों प्रकार के स्पर्धकों का उदय रहने से क्षायोपशमिक अवस्था नहीं होती है तो लब्धि ज्ञान नहीं होता ॥३०२॥
इसलिये प्रकृत अर्थ यही है कि इन्द्रियजन्य ज्ञान दिङ्मात्र है, क्योंकि यह अपने विषयभूत सब पदार्थों के एकदेश को ही जानता है ॥३०३॥
उन सब विषयों में से एक-एक अर्थ के एक-एक खण्ड को यह ज्ञान ग्रहण करता है इसलिये यह खण्डित है । तथा पदार्थों के पृथक-पृथक रहने पर यह ज्ञान क्रम से नियत-पदार्थ को ही ग्रहण करता है, इसलिये प्रत्येक है ॥३०४॥