आस्तामित्यादिदोषाणां सन्निपातास्पदं पदम्‌ ।
ऐन्द्रियं ज्ञानमप्यस्ति प्रदेशचलनात्मकम् ॥305॥
निष्क्रियस्यात्मनः काचिद्‌ यावदौदयिकी क्रिया ।
अपि देशपरिस्पन्दां नोदयोपाधिना विना ॥306॥
नासिद्धमुदयोपाधेर्दु:खत्वं कर्मणः फलात्‌ ।
कर्मणो यत्फलं दुःखं प्रसिद्धं परमागमात्‌ ॥307॥
बुद्धिपर्वकदुःखेषु दृष्टान्ताः सन्ति केचन ।
नाबुद्धिपूर्वके दु:खे ज्ञानमात्रैकगौचरे ॥308॥
अस्त्यात्मनो महादुःखं गाढं बद्धस्य कर्मभि: ।
मनःपृर्वं कदाचिद्वै शश्वत्‌ सर्वप्रदेशजम्‌ ॥309॥
अस्ति स्वस्यानुमेयत्वाद् बुद्धिजं दुःखमात्मनः ।
सिद्धत्वात्‌ साधनेनालं वर्जनीयो वृथा श्रम: ॥310॥
अन्वयार्थ : यह इन्द्रिय-ज्ञान व्याकुलता आदि अनेक दोषों के प्राप्त होने का स्थान तो है ही, साथ ही वह आत्म-प्रदेशों की चंचलता रूप भी है ॥३०५॥
निष्क्रिय आत्मा की जब तक कोई औदयिक क्रिया होती है तभी तक वह आत्म-प्रदेशों का परिस्पन्द होता है, क्‍योंकि उदय रूप उपाधि के बिना प्रदेश-परिस्पन्द नहीं होता ॥३०६॥
उदयरूप उपाधि दुःखरूप है यह बात असिद्ध नहीं है, क्योंकि वह कर्म का फल है और कर्म का जो फल है वह दुःखरूप है यह बात परमागम से सिद्ध है ॥३०७॥
बुद्धिपूर्वक दुःखों के विषय में कितने ही दृष्टान्त मिलते हैं, किन्तु अबुद्धिपूर्वक दुःख केवल ज्ञानगम्य है । उसके विषय में एक भी दृष्टान्त नहीं मिलता ॥३०८॥
क्योंकि कर्मों से गाढ़ बंधे हुए इस आत्मा के सब प्रदेशों में होने वाला महादुःख सदा काल है । किन्तु मन के निमित्त से होनेवाला दुःख कदाचित् ही होता है ॥३०९॥
आत्मा का जो बुद्धिपूर्वक दुःख है वह अपने अनुमान का विषय होने से सिद्ध है । उसके साधन करने की कोई आवश्यकता नहीं । इसकी सिद्धि के लिये व्यर्थ का श्रम वर्जनीय है ॥३१०॥