साध्यं तन्निहितं दुःखं नाम यावदबुद्धिजम् ।
कार्यानुमानतो हेतुर्वाच्यो वा परमागमात्‌ ॥311॥
अस्ति कार्यानुमानाद्वै कारणानुमितिः कचित्‌ ।
दर्शनान्नदपूरस्य देवो वृष्टो यथोपरि ॥312॥
अस्त्यात्मनो गुणः सौख्यं स्वतःसिद्धमनश्वरम् ।
घातिकर्माभिघातत्वादसद्वाऽदृश्यतां गतम्‌ ॥313॥
सुखस्यादर्शनं कार्यलिङ्गं लिङ्गमिवान्न तत्‌ ।
कारणम् तद्विपक्षस्य दुःखस्यानुमितिः सतः ॥314॥
सर्वसंसारिजीवानामस्ति दुःखमबुद्धिजम्‌ ।
हेतोर्नैसर्गिकस्यात्र सुखस्याभावदर्शनात्‌ ॥315॥
नासौ हेतुरसिद्धोऽस्ति सिद्धसंदृष्टिदर्शनात् ।
व्याप्तेः सद्भावतो नूनमन्‍यथानुपपत्तित: ॥316॥
व्याप्तिर्यथा विचेष्टस्य मूर्छितस्येव कस्यचित् ।
अदृश्यमपि मद्यादिपानमस्त्यत्र कारणम्‌ ॥317॥
अस्ति संसारिजीवस्य नूनं दुःखमबुद्धिजम् ।
सुखस्यादर्शनं स्वस्य सर्वतः कथमन्यथा ॥318॥
अन्वयार्थ : किन्तु इसमें अन्तर्निहित जो अबुद्धिपूर्वक दुःख है उसकी सिद्धि अवश्य करनी चाहिये । या तो कार्यानुमान के अनुसार उसकी सिद्धि में हतु कहना चाहिये या परमागम से उसका कथन करना चाहिये ॥३११॥
कहीं-कहीं कार्य को देखकर उससे कारण का अनुमान हो जाता है । जैसे नदी के पूर को देखने से यह अनुमान हो जाता है कि ऊपर कहीं पर मेघ बरसा है ॥३१२॥
स्वत-सिद्ध और अविनाशीक एक सुख नाम का गुण है जो घातिया कर्मों के द्वारा घातित हो रहा है, इसलिये असत्‌ पदार्थ के समान वह प्रकट दिखाई नहीं देता ॥३१३॥
इस प्रकार इस सुख का अदर्शन ही अबुद्धिपूर्वक दुःख की सिद्धि में अन्य हेतुओं के समान कार्य हेतु है । वह उसके विपक्षभूत दुःख का कारण है जिससे उसका अनुमान होता है ॥३१४॥
इससे हम यह अनुमान करते हैं कि सब संसारी जीवों के अबुद्धिपू्र्वक दुःख है, क्योंकि उनके नैसर्गिक सुख का अभाव देखा जाता है ॥३१४॥
यदि कहा जाय कि यह सुख का अदर्शन रूप हेतु असिद्ध है सो भी बात नहीं है, क्‍योंकि इसके पोषक प्रसिद्ध दृष्टान्त के पाये जाने से और दुःख के सद्भाव के साथ सुख के अदर्शन की व्याप्ति होने से यह हेतु सिद्ध है । अन्यथा अबुद्धिपूर्वक दुःख की उपपत्ति नहीं बन सकती है ॥३१६॥
यहां जो दुःख के सद्भाव के साथ सुख के अदर्शन को व्याप्ति बतलाई है सो वह इस प्रकार घटित होती है कि जिस प्रकार चेष्टा रहित किसी मूर्छित पुरुष को देखकर हम यह जान लेते हैं कि इसका कारण मदिरा आदि का पान है । मदिरा आदि का पान यद्यपि अदृश्य है तो भी मूर्च्छित अवस्थारूप काय को देखकर जैसे इसके मदिरा पानरूप कारण का ज्ञान हो जाता है ॥३१७॥
इसी प्रकार हम यह भी जानते हैं कि संसारी जीव के अबुद्धिपूर्वक दुःख है, क्‍योंकि उसके सुख नहीं दिखाई देता । यदि उसके अबुद्धिपूर्वक दु:ख नहीं माना जाय तो उसके आत्मीक सुख का सर्वथा अदर्शन कैसे बन सकता है ॥३१८॥