
तद्यथा कश्चिदत्राह नास्ति बद्धस्य तत्सुखम् ।
यत्सुखं स्वात्मनस्तत्त्वं मूर्च्छितं कर्मभिर्बलात् ॥321॥
अस्त्यनिष्टार्थसंयोगाच्छाररं दुःखमात्मनः ।
ऐन्द्रियं बुद्धिजं नाम प्रसिद्धं जगति स्फुटम् ॥322॥
मनोदेहेन्द्रियादिभ्यः पृथग् दुःखं नाबुद्धिजम् ।
तद्-ग्राहकप्रमाणस्य शून्यत्वाद् व्योमपुष्पवत् ॥323॥
साध्ये वाऽबुद्धिजे दु:खे साधनं तत्सुखक्षतिः ।
हेत्वाभासः स व्याप्यत्त्वासिद्धौ व्याप्तेरसंभवात् ॥324॥
अन्वयार्थ : जो सुख अपनी आत्मा का स्वरूप है कर्मों से बल-पूर्वक मूर्च्छित हो रहा है, इसलिये वह बद्ध जीव के नहीं पाया जाता ॥३२१॥
माना कि आत्मा का अनिष्ट अर्थ के संयोग से शारीरिक दुःख होता है पर उसकी जग में इन्द्रियजनित बुद्धिपूर्वक दुःख रूप से प्रसिद्धि है ॥३२२॥
यदि कोई कहे कि अबुद्धिपूर्वक होनेवाला दुःख मन, देह और इन्द्रिय आदिक से भिन्न है सो यह बात भी नहीं है, क्योंकि आकाशफूल के समान इसका ग्राहक कोई प्रमाण नहीं पाया जाता ॥३२३॥
अतः अबुद्धिपूर्वक दुःख की सिद्धि में जो आत्मसुख का अभावरूप हेतु दिया जाता है वह हेत्वाभास है, क्योंकि व्याप्य के असिद्ध होने पर उसके साथ सुखाभाव की व्याप्ति ही घटित नहीं होती ?