
नैवं यत्ताद्विपक्षस्य व्याप्तिर्दुःखस्य साधने ।
कर्मणस्तद्विपक्षत्वं सिद्धं न्यायात्कुतोन्यथा ॥325॥
विरुद्धधर्मयोरेव वैपक्ष्यं नाविरुद्धयो: ।
शीतोष्णधर्मयोवैरं न तत् क्षारद्रवत्वयो: ॥326॥
अन्वयार्थ : ऐसा नहीं है, क्योंकि सुख के विपक्षभूत दुःख के सिद्ध करने में अबुद्धिपूर्वक होनेवाले दुःख के साथ सुखाभाव की व्याप्ति है। यदि एसा नहीं है तो फिर कर्म सुख के विपक्षी हैं यह बात किस युक्ति से सिद्ध होगी ? ॥३२५॥
ऐसा नियम है कि परस्पर विरुद्धभूत दो धर्मों में ही विपक्षपना पाया जाता है अविरोधी धर्मों में नहीं, क्योंकि हम देखते हैं कि परस्पर विरोधी शीत और उष्ण इन दो धर्मों में ही बैर होता है, क्षारत्व और द्रवत्व इन दो धर्मों में नहीं । यतः सुख-दुःख का विपक्षी है अतः दुःख की सुखाभाव के साथ व्याप्ति मानने में कोई बाधा नहीं यह उक्त कथन का तात्पर्य है ॥३२६॥