


निराकुलं सुखं जीवशक्तिर्द्रव्योपजीविनी ।
तद्विरुद्धाकुलत्वं वै शक्तिस्तद्घातिकर्मणः ॥327॥
असिद्धा न तथा शक्ति: कर्मणः फलदर्शनात् ।
अन्यथात्मतया शक्तेर्बाधकं कर्म तत्कथम् ॥328॥
नयात् सिद्धं ततो दुःखं सर्वदेशप्रकम्पवत् ।
आत्मनः कर्मबद्धस्य यावत्कर्मरसोदयात् ॥329॥
देशतोऽस्त्यत्र दृष्टान्तो वारिधिर्वायुना हतः ।
व्याकुलोऽव्याकुलः स्वस्थः स्वाधिकारप्रमत्तवान् ॥330॥
न च वाच्यं सुखं शश्वद्विद्यमानमिवास्ति तत् ।
बद्धस्याथाप्यबद्धस्य हेतोस्तच्छक्तिमात्रतः ॥331॥
अत्र दोषावतारस्य युक्ति: प्रागेव दर्शिता ।
यथा स्वस्थस्य जीवस्य व्याकुलत्वं कुतोऽर्थतः ॥332॥
न चैकतः सुखव्यक्तिरेकतो दुःखमस्ति तत् ।
एकस्यैकपदे सिद्धमित्यनेकान्तवादिनाम् ॥333॥
अनेकान्तः प्रमाणं स्यादर्थादिकत्र वस्तुनि ।
गुणपर्याययोर्द्वेताद् गुणमुख्यव्यवस्थया ॥334॥
अभिव्यक्तिस्तु पर्यायरूपा स्यात् सुखदुःखयोः ।
तदात्वे तन्न तद्-द्वैतं द्वैतं चेद् द्रव्यतः क्वचित् ॥335॥
बहुप्रलपनेनालं साध्यं सिद्धं प्रमाणतः ।
सिद्धं जनागमाच्चापि स्वतःसिद्धो यथाक्रमः ॥336॥
एतत्सर्वज्ञवचनमाज्ञामात्रं तदागमः ।
यावत्कर्मफलं दुःखं पच्यमानं रसोन्मुखम् ॥337॥
अभिज्ञानं यदत्रैतज्जीवाः कार्मणकायकाः ।
आ एकाक्षादापञ्चाक्षा अप्यन्ये दुःखिनोमताः ॥338॥
तत्राभिव्यञ्जको भावो वाच्यं दुःखमनीहितम् ।
घातिकर्मोदयाघाताज्जीवदेशवधात्मकम् ॥339॥
अन्यथा न गति: साध्वी दोषाणां सन्निपाततः ।
संज्ञिनां दु:खमेवैकं दुःखं नाऽसंज्ञिनामिति ॥340॥
महच्चेत्संज्ञिनां दुःखं स्वल्पं चाऽसंज्ञिनां न वा ।
यतो नीचपदादुच्चै: पदं श्रेयस्तथामतम् ॥341॥
अन्वयार्थ : निराकुलता का नाम सुख है, जो जीव की अनुजीवी शक्ति है और इसके विरुद्ध जो आकुलता है वह सुख का घात करनेवाले कर्मों की शक्ति है ॥३२७॥
आकुलता सुख गुण के घातक कर्मों की शक्ति है यह बात असिद्ध नहीं है, क्योंकि कर्म का फल ऐसा ही देखा जाता है । यदि ऐसा नहीं है तो वह कर्म आत्म-शक्ति के बाधक केसे हो सकता है ॥३२८॥
इसलिए कर्मों से बंधे हुए आत्मा के जब तक कर्मों का रसोदय रहता है तबतक उसके सब प्रदेशों में कम्प पैदा करनेवाला दुःख होता है यह बात युक्ति से सिद्ध हो गई ॥३२९॥
इस विषयक एकदेश दृष्टान्त यह है कि वायु से ताडित हुआ समुद्र स्वाधिकार में प्रमत्त होने के कारण व्याकुल देखा जाता है । किन्तु वही समुद्र जब स्वस्थ हाता है तब अव्याकुल देखा जाता है ॥३३०॥
यदि कोई कहे कि चाहे आत्मा बद्ध हो, चाहे अबद्ध हो किन्तु सुख सदा विद्यमान रहता है, क्योंकि वह आत्मा की शक्ति है, इसलिये उसका अभाव कभी नहीं हो सकता, सो यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा मानने पर अनेक दोष आते हैं जिनकी पोषक युक्ति पहले ही दिखला आये हैं । वास्तव में जीव स्वस्थ है उसके व्याकुलता कैसे हो सकती है अर्थात् नहीं हो सकती । इससे ज्ञात होता है कि संसारी जीव के सुख का अभाव ही है ॥३३१-३३२॥
यदि कहा जाय कि एक ही आत्मा के एक अपेक्षा से सुखगुण की अभिव्यक्ति और एक अपेक्षा से दुःख ये दोनों बन जाएंगे, क्योंकि अनेकान्त वादियों के मत में एक ही आधार से दोनों की सिद्धि मानने में काई बाधा नहीं आती, सो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही वस्तु में यद्यपि अनेकान्त प्रमाण माना गया है पर वह गुण और पर्याय इन दोनों में गौण और मुख्य व्यवस्था की अपेक्षा से ही प्रमाण माना गया है ॥३३३-३३४॥
किन्तु सुख और दुःख इन दोनों की अभिव्यक्ति पर्याय रूप से होती है, इसलिये पर्यायरूप से इनका द्वैत नहीं बन सकता। यदि किसी आत्मा में इनका द्वैत माना भी जाता है तो वह शक्ति की अपेक्षा से ही माना जा सकता है ॥३३५॥
अब इस विषय में और अधिक कथन करने से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि एक तो प्रमाण से इष्ट साध्य की सिद्ध ही की जा चुकी है । दूसरे जैनागम से भी इसकी सिद्धि हो जाती है। और आगम स्वतः सिद्ध है इसलिये उसके सिद्ध करने के लिये अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं ॥३३६॥
सर्वेज्ञ की जो आज्ञा है वही उनका आगम है और सर्वज्ञ का वचन यह है कि फल देने के सन्मुख हुआ उदयागत जितना भी कर्मफल है वह सब दुःख ही है ॥३३७॥
इस विषय में यह उदाहरण है कि एकेन्द्रियों से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यंत जितने भी कार्मणकायवाले या अन्य कायवाले जीव हैं वे सब ही दुखी माने गये हैं ॥३३८॥
घाति कर्मों के उदय के आघात से जो जीव के प्रदेशों का घात हो रहा है वास्तव में वही अबुद्धिजन्य दुःख शब्द का वाच्य है और जिसका अभिव्यंजक रागादि भाव माना गया है ॥३३९॥
यदि ऐसा नहीं माना जाय तो अनेक दोष प्राप्त होते हैं जिससे ऐसा माने बिना काम ही नहीं चलता। उदादरणार्थ--यदि कर्मों के फलमात्र को दुःख न माना जाय तो संज्ञियों के ही केवल दु:ख प्राप्त होता है वह असंज्ञियों के नहीं प्राप्त होता ॥३४०॥
यदि कहा जाय कि संज्ञी जीवों को बहुत दुःख होता है और असंज्ञी जीवों को थोड़ा दुःख होता है सो यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि नीच पद से उच्च पद सदा श्रेष्ठ माना गया ॥३४१॥