
न च वाच्यं शरीरं च स्पर्शनादीन्द्रियाणि च ।
सन्ति सूक्षमेषु जीवेषु तत्फलं दुःखमङ्गिनाम् ॥342॥
अव्याप्तिः कार्मणावस्थावस्थितेषु तथा सति ।
देहेन्द्रियादिनोकर्मशून्यस्य तस्य दर्शनात् ॥343॥
अस्ति चेत् कार्मणो देहस्तत्र कर्मकदम्बकः ।
दुःखं तद्वेतुरित्यस्तु सिद्धं दुःखमनीहितम् ॥344॥
अपि सिद्धं सुखं नाम यदनाकुललक्षणम् ।
सिद्धत्वादपि नोकर्मविप्रमुक्ता चिदात्मन: ॥345॥
अन्वयार्थ : यदि कहा जाय कि सूक्ष्म जावों के भी शरीर और स्पर्शन आदि इन्द्रियाँ होती हैं अतः उनके फल-स्वरूप उन जीवों के भी दुःख सिद्ध हो जायगा सो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर जब वे जीव कार्मण अवस्था में अवस्थित रहते हैं, तब उनके दुःख नहीं सिद्ध होगा, क्योंकि तब यह जीव शरीर और इन्द्रिय आदि की नोकर्म वर्गणाओं से रहित देखा जाता है ॥३४२-३४३॥
यदि कहा जाय कि वहाँ भी कर्मों का समुदायरूप कार्मण शरीर पाया जाता है, इसलिये शरीर हेतुक दुःख वहाँ पर भी है तो इससे अबुद्धिपूर्वक दुःख की सिद्धि सुतरां हो जाती है ॥३४४॥
तथा इस कथन से अनाकुल लक्षणवाला सुख भी सिद्ध हो जाता है जो कि कर्मों के समान नोकर्मों का त्याग होने पर जीव का प्राप्त होता है ॥३४५॥