
तद्यथा सुखदुःखादिभावो जीवगुणः स्वयम् ।
ज्ञानं तद्वेदकं नूनं नार्थाज्ज्ञानं सुखादिमत् ॥399॥
सम्यक्त्वं वस्तुतः सूक्ष्ममस्ति वाचामगोचरम् ।
तस्माद् वक्तुं च श्रोतुं च नाधिकारी विधिक्रमात् ॥400॥
प्रसिद्धं ज्ञानमेवैकं साधनादिविधौ चितः ।
स्वानुभूत्येकहेतुश्च तस्मात्तत् परमं पदम् ॥401॥
तत्राप्यात्मानुभूतिः सा विशिष्टं ज्ञानमात्मनः ।
सम्यक्त्वेनाविनाभूतमन्वयाद् व्यतिरेकतः ॥402॥
ततोऽस्ति योग्यता वक्तुं व्याप्तेः सद्भावतस्तयोः ।
सम्यक्त्वं स्वानुभूतिः स्यात् सा चेच्छुद्धनयात्मिका ॥403॥
अन्वयार्थ : आशय यह है कि सुख दु:खादि भाव यद्यपि जीव के निज गुण हैं और ज्ञान उनका वेदक है तथापि वास्तव में ज्ञान सुखादिरूप नहीं है ॥३९९॥
सम्यग्दर्शन वास्तव में सूक्ष्म है और वचनों का विषय नहीं है, इसलिये कोई भी जीव विधि-रूप से उसके कहने ओर सुनने का अधिकारी नहीं है ॥४००॥
एक ज्ञान ही ऐसा प्रसिद्ध गुण है जिससे आत्मा की सिद्धि होती है और जो स्वात्मानुभूति का कारण है, इसलिये वह सर्वोत्कृष्ट है ॥४०१॥
उसमें भी वह आत्मानुभूति आत्मा का ज्ञान विशष है और उसका सम्यग्दर्शन के साथ अन्वय और व्यतिरेक दोनों प्रकार से अविनाभाव पाया जाता है ॥४०२॥
चूंकि सम्यग्दर्शन और स्वात्मानुभूति इनकी व्याप्ति पाई जाती है इस लिये स्वात्मानुभूतिरूप से सम्यग्दर्शन कहने योग्य हो जाता है । तब यह कहा जाता है कि स्वात्मानुभूति ही सम्यकत्व है । किन्तु तब उस स्वात्मानुभूति का शुद्ध नयरूप होना आवश्यक है ॥४०३॥