
किञ्चास्ति विषमव्याप्तिः सम्यक्वानुभवद्व्यो: ।
नोपयोगे समव्याप्तिरस्ति लब्धिविधौ तु सा ॥404॥
तद्यथा स्वानुभूतौ वा तत्काले वा तदात्मनि ।
अस्त्यवश्यं हि सम्यक्त्वं यस्मात्सा न विनापि तत् ॥405॥
यदि वा सति सम्यक्त्वे स स्याद्वा नोपयोगवान् ।
शुद्धस्यानुभवस्तत्र लब्धिरूपोऽस्ति वस्तुत: ॥406॥
हेतुस्तत्रापि सम्यक्त्वोत्पत्तिकालेऽस्त्यवश्यत : ।
तज्ज्ञानावरणस्योच्चैरस्त्यवस्थान्तरं स्वतः ॥107॥
यस्माज्ज्ञानमनित्यं स्याच्छद्मस्थस्योपयोगवत् ।
नित्यं ज्ञानमछद्मस्थे छद्मस्थस्य च लब्धिमत् ॥408॥
निन्यं सामान्यमात्रत्वात् सम्यक्त्वं निर्विशेषतः ।
तत्सिद्धा विषमव्याप्तिः सम्यक्त्वानुभवद्वयो: ॥409॥
अन्वयार्थ : इतनी विशेषता है कि सम्यग्दर्शन और स्वात्मानुभूति इनकी विषम व्याप्ति है, क्योंकि उपयोगरूप अवस्था के रहते हुए इनकी समव्याप्ति नहीं पाई जाती । यदि पाई भी जाती है तो वह लब्धिरूप अवस्था के रहते हुए ही पाई जाती है ॥४०४॥
खुलासा इस प्रकार है--जब स्वानुभव होता है या स्वानुभव का काल रहता है तब आत्मा में सम्यकत्व अवश्य पाया जाता है, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना स्वानुभूति नहीं हो सकती ॥४०५॥
अथवा सम्यक्त्व के होने पर आत्मा उपयोगवाला होता भी है और नहीं भी होता । किन्तु इतना अवश्य है कि सम्यक्त्व के होने पर शुद्ध-आत्मा का अनुभव लब्धिरूप अवश्य रहता है ॥४०६॥
इसका कारण यह है कि सम्यक्त्व की उत्पत्ति के समय स्वानुभूति ज्ञानावरण का क्षयोपशम स्वयमेव नियम से हो जाता है ॥४०७॥
क्योंकि छद्मस्थ का उपयोगात्मक ज्ञान अनित्य होता है और केवली का ज्ञान नित्य होता है । साथ ही छद्मस्थ का भी लब्धिरूप ज्ञान नित्य होता है ॥४०५॥
तथा अपने अवान्तर भेदों की अपेक्षा किये बिना सामान्यरूप से सम्यक्त्व नित्य है, इसलिये सम्यक्त्व और अनुभव इन दोनों की विषम-व्याप्ति सिद्ध होती है ॥४०६॥