
अपि सन्ति गुणाः सम्यक् श्रद्धानादिविकल्पकाः ।
उद्देशो लक्षणं तेषां तत्परीक्षाधुनोच्यते ॥410॥
तत्रोदेशो यथा नाम श्रद्धारुचिप्रतीतयः ।
चरण च यथाम्नायमर्थात्तत्त्वार्थगोचरम् ॥411॥
तत्त्वार्थाभिमुखी बुद्धि: श्रद्धा सात्म्यं रुचिस्तथा ।
प्रतीतिस्तु तथेति स्यात् स्वीकारश्चरणं क्रिया ॥412॥
अर्थादाद्यत्रिकं ज्ञानं ज्ञानस्यैवात्र पर्ययात् ।
चरणं वाक्कायचेतोभिर्व्यापारः शुभकर्मसु ॥413॥
व्यस्ताश्चैते समस्ता वा सद्-दृष्टेर्लक्षणं न वा ।
सपक्षे वा विपक्षे वा सन्ति यद्वा न सन्ति वा ॥414॥
स्वानुभूति सनाथाश्चेत् सन्ति श्रद्धादयो गुणाः ।
स्वानुभूतिं विनाभासा नार्थाच्छुद्धादयो गुणाः ॥415॥
तत्स्याच्छुद्धादयः सर्वे सम्यक्त्वं स्वानुभूतिमत् ।
न सम्यक्त्वं तदाभासा मिथ्याश्रद्धादिवत् स्वतः ॥416॥
सम्यङ्मिथ्याविशेषाभ्यां विना श्रद्धादिमात्रकाः ।
सपक्षवद्विपक्षेऽपि वृत्तित्वाद् व्यभिचारिणः ॥417॥
अर्थाच्छ्रद्धादय: सम्यग्दृष्टिद्धादयो यतः ।
मिथ्याश्रद्धादयो मिथ्या नार्थाच्छ्रद्धादयो यतः ॥418॥
अन्वयार्थ : यतः सम्यक् श्रद्धान आदि के भेद से और भी बहुत से गुण हैं, इसलिये यहाँ अब उनका उद्देश, लक्षण और परीक्षा कहते हैं ॥४१०॥
उनमें से उद्देश इस प्रकार है । जेसे कि आम्नाय के अनुसार जीवादि पदार्थ विषयक श्रद्धा, रुचि, प्रतीति और चरण को सम्यक्त्व कहना उद्देश है ॥४११॥
इनमें से जीवादि पदार्थों के सन्मुख बुद्धि का होना श्रद्धा है । बुद्धि का तन्मय हो जाना रुचि है । 'एसा ही है' इस प्रकार स्वीकार करना प्रतीति है और अनुकूल क्रिया करना चरण है ॥४१२॥
इनमें से आदि के तीन वास्तव में ज्ञान ही हैं, क्योंकि श्रद्धा, रुचि और प्रतीति ये ज्ञान की ही पर्याय हैं । तथा चरण यह चारित्रगुण की पर्याय है, क्योंकि शुभ कार्यों में जो वचन, काय और मन का व्यापार होता है उसे चरण कहते हैं ॥४१३॥
ये श्रद्धा आदि चारों प्रथक् प्रथक् रूप से अथवा समस्त रूप से सम्यग्दृष्टि के लक्षण भी हैं और नहीं भी हैं, क्योंकि ये सपक्ष ओर विपक्ष दोनों ही अवस्थाओं में पाये जाते हैं और नहीं भी पाये जाते हैं ॥४१४॥
यदि स्वानुभूति के साथ होते हैं तो श्रद्धादिक गुण हैं और स्वानुभूति के बिना वे वास्तव में गुण नहीं हैं किन्तु गुणाभास हैं ॥४१५॥
इसलिये यह निष्कर्ष निकला कि श्रद्धा आदिक सभी गुण स्वानुभूति के साथ समीचीन हैं और सम्यक्त्व के बिना मिथ्या श्रद्धा आदिरूप होने के कारण वे तदाभास हैं ॥४१६॥
सम्यक् और मिथ्या विशेषण के बिना जब केवल श्रद्धा आदिक विवक्षित होते हैं तब उनकी सपक्ष के समान विपक्ष में वृत्ति देखी जाती है अतः वे व्यभिचारी हैं ॥४१७॥
यतः सम्यग्दृष्टि के श्रद्धा आदि ही वास्तव में श्रद्धा आदिक हैं अतः मिथ्यादृष्टि के श्रद्धा आदिक को मिथ्या जानना चाहिये । वे वास्तव में श्रद्धा आदिक नहीं हैं ॥४१८॥