
ननु तत्त्वरुचिः श्रद्धा श्रद्धामात्रैकलक्षणात् ।
सम्यङ्मिथ्याविशेषाभ्यां सा द्विधा तत्कुतोऽर्थतः ॥ 410 ॥
अन्वयार्थ : जब कि तत्त्व-रुचि का नाम श्रद्धा है क्योंकि उसका 'श्रद्धा' यही एकमात्र लक्षण है । तब फिर वह वास्तव में सम्यक् श्रद्धा और मिथ्या श्रद्धा ऐसी दो भेदवाली कैसे हो जाती है ?