नैवं यतः समव्याप्तिः श्रद्धास्वानुभवद्वयो: ।
नूनं नानुपलब्धेऽर्थे श्रद्धा खरविषाणवत्‌ ॥420॥
विना स्वात्मानुभूतिं तु या श्रद्धा श्रुतमात्रतः ।
तत्त्वार्थानुगताप्यर्थाच्छ्रद्धा नानुपलब्धितः ॥421॥
लब्धिः स्यादविशेषाद्वा सदसतोरुन्मत्तवत्‌ ।
नोपलब्धिरिहार्थात्सा तच्छेषानुपलब्धिवत्‌ ॥422॥
ततोऽस्ति यौगिकी रूढिः श्रद्धा सम्यक्त्वलक्षणम्‌ ।
अर्थादप्यविरुद्धं स्यात्‌सूक्तं स्वात्मानुभूतिवत् ॥423॥
अन्वयार्थ : ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि श्रद्धा और स्वानुभव इन दोनों में समव्याप्ति है, इसलिये अनुपलब्ध पदार्थ में गधे के सींग के समान श्रद्धा हो ही नहीं सकती ॥४२०॥
स्वानुभूति के बिना केवल श्रुत के आधार से जो श्रद्धा होती है वह यद्यपि तत्त्वार्थानुगत है तो भी तत्त्वार्थ की उपलब्धि नहीं होने से वह वास्तव में श्रद्धा नहीं है ॥४२१॥
सत्‌ और असत्‌ की विशेषता न करके उन्मत्त पुरुष के समान पदार्थों की जो उपलब्धि होती है वह वास्तव में उपलब्धि नहीं है किन्तु उन पदार्थों के सिवा शेष पदार्थों की अनुपलब्धि के समान वह अनुपलब्धि ही है ॥४२२॥
इसलिये यौगिक रूढ़ि के आधार से श्रद्धा सम्यक्त्व का लक्षण है यह कहना वास्तव में तब अविरुद्ध हो सकता है जब उसे स्वानुभूति से युक्त मान लिया जाय ॥४२३॥