
गुणाश्चान्ये प्रसिद्धा ये सद्दृष्टे: प्रशमादयः ।
बहिर्दृष्ट्या यथास्वं ते सन्ति सम्यक्त्वलक्षणा: ॥424॥
तत्राद्यः प्रशमो नाम संवेगश्च गुणः क्रमात् ।
अनुकम्पा तथास्तिक्यं वक्ष्ये तल्लक्षणं यथा ॥425॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दष्टि जीव के जो प्रशमादिक अन्य गुण प्रसिद्ध हैं बाह्यदष्टि से वे भी यथायोग्य सम्यक्त्व के लक्षण हैं ॥४२४॥
उनमें से पहला प्रशम गुण है, दूसरा संवेग है, तीसरा अनुकम्पा है और चौथा आस्तिक्य है । अब क्रम से इनका लक्षण कहते हैं ।