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प्रश्न - शंका भी मिथ्यात्व कर्म के उदय से होती है यह किस युक्ति से जाना जाता है ?
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ननु शङ्काकृतो दोषो यो मिथ्यानुभवो नृणाम् ।
सा शङ्कापि कुतो न्यायादस्ति मिथ्योपजीविनी ॥493॥
अन्वयार्थ :
मनुष्यों को जो मिथ्या अनुभव होता है वह यदि शंकाकृत दोष है तो वह शंका भी मिथ्यात्व कर्म के उदय से होती है यह किस युक्ति से जाना जाता है ?