अत्रोत्तरं कुदृष्टिर्य: स सप्तभिर्भयैर्युतः ।
नापि स्पृष्टः सुदृष्टिर्य: स सप्तभिर्भयैर्मनाक् ॥494॥
परत्रात्मानुभूतेर्वै विना भीतिः कुतस्तनी ।
भीतिः पर्यायमूढानां नात्मतत्त्वैकचेतसाम्‌ ॥495॥
ततो भीत्यानुमेयोऽस्ति मिथ्याभावो जिनागमात् ।
सा च भीतिरवश्यं स्याद्धेतुः स्वानुभवक्षते: ॥496॥
अस्ति सिद्धं परायत्तो भीतः स्वानुभवच्युतः ।
स्वस्थ्यस्य स्वाधिकारत्वान्नूनं भीतेरसम्भवात्‌ ॥497॥
अन्वयार्थ : इसका उत्तर यह है कि जो मिथ्यादृष्टि है वह सात भय सहित है और जो सम्यग्दृष्टि है वह सात भयों से थोड़ा भी स्पृष्ट नहीं है ॥४९४॥
भय उन्हीं को होता है जो पर में आत्मत्व का अनुभव करते हैं । इसके बिना भय कैसे हो सकता है । वास्तव में जो पर्यायबुद्धि जीव हैं उन्हीं को भय होता है, जिनका चित्त केवल आत्मतत्त्व में लगा हुआ है, उन्हें भय नहीं होता ॥४९५॥
इसलिये भय के सद्भाव से मिथ्याभाव का अनुमान किया जाता है ओर वह भय स्वानुभव के विनाश का अवश्य हेतु है यह जिनागम से जाना जाता है ॥४९६॥
यह्‌ बात सिद्ध है कि जो पराधीन है वह भय सहित है और आत्मानुभव से च्युत है, क्योंकि स्वस्थ पुरुष स्वाधिकारी होता है इसलिये उसके भय का पाया जाना
असंभव है ॥४९७॥