
ननु सन्ति चतस्रोऽपि संज्ञास्तस्यास्य कस्यचित् ।
अर्वाक् च तत्परिच्छेदस्थानादस्तित्वसम्भवात् ॥498॥
तत्कथं नाम निर्भीकः सर्वतो दृष्टिवानपि ।
अप्यनिष्टार्थसंयोगादस्त्यध्यक्षं प्रयत्नवान् ॥499॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टियों में से किसी-किसी सम्यग्दृष्टि के चारों ही संज्ञाएँ होती हैं, क्योंकि जिन गुणस्थानों में इनकी व्युच्छित्ति होती है उससे पहले इनका अस्तित्व पाया जाता है, इसलिये सम्यग्दृष्टि जीव सब प्रकार से निर्भीक होता है यह कैसे सम्भव है । दूसरे अनिष्ट अर्थ का संयोग होने पर से बचने के लिये वह प्रयत्न भी करता है यह बात भी हम प्रत्यक्ष से देखते हैं, इसलिये भी वह भय-रहित है यह बात कैसे सम्भव है ?