सत्यं भीकोऽपि निर्भीकस्तत्स्‍वामित्वाद्यभावतः ।
रूपि द्रव्यं यथा चक्षु: पश्यदपि न पश्यति ॥500॥
सन्ति संसारिजीवानां कर्मांशाश्चोदयागताः ।
मुह्यन्‌ रज्यन् द्विषंस्तत्र तत्फलेनोपयुज्यते ॥501॥
एतेन हेतुना ज्ञानी निःशंकों न्‍यायदर्शनात्‌ ।
देशतोऽप्यत्र मूर्च्छायाः शंकाहेतोरसम्भवात्‌ ॥502॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक है तो भी वह अपने को उनका स्वामी आदि नहीं मानता, इसलिये भय सहित होकर भी वह निर्भय है । जैसे चक्षु रूपी पदार्थ को देखता हुआ भी नहीं देखता है वैसे यह भी भय सहित होकर भी निर्भय ही है ॥५००॥
संसारी जीवों के सत्ता में स्थित कर्म सदा ही उदय में आते रहते हैं जिससें यह जीव उनमें मोह, राग और द्वेष करता हुआ उनके फल को भोगने के लिये बाध्य होता है ॥५०१॥
इस कारण से ज्ञात होता है कि ज्ञानी जीव नि:शंक है क्योंकि इसके शंका का कारण एकदेश भी मूर्च्छा नहीं पाई जाती है ॥५०२॥