
स्वात्मसञ्चेतनं तस्य कीदृगस्तीति चिन्त्यते ।
येन कर्मापि कुर्वाणः कर्मणा नोपयुज्यते ॥503॥
तत्र भीतिरिहामुत्र लोके वै वेदनाभयम् ।
चतुर्थी भीतिरत्राणं स्यादगुप्तिस्तु पञ्चमी ॥504॥
भीतिः स्याद्वा तथा मृत्युर्भीतिराकस्मिकं ततः ।
क्रमादुद्देशिताश्चेति सप्तैताः भीतयः स्मृताः ॥505॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टि के अपने आत्मा का अनुभव कैसा होता है अब इसका विचार करते हैं जिससे कर्म को करता हुआ भी वह कर्म से उपयुक्त नहीं होता ॥५०३॥
पहला इहलोक-भय, दूसरा परलोक-भय, तीसरा वेदना-भय, चौथा अत्राण-भय, पांचवां अगुप्ति-भय, छठा मृत्यु-भय और सातवां आकस्मिक-भय इस प्रकार क्रम से ये सात भय कहे गये जानना चाहिये ॥५०४-५०५॥