
तत्रेह लोकतो भीतिः क्रन्दितं चात्र जन्मनि ।
इष्टार्थस्य व्ययो माभून्माभून्मेऽनिष्टसङ्गम: ॥506॥
स्थास्यतीदं धनं नो वा दैवान्मा भूद्दरिद्रता ।
इत्याद्याधिश्चिता दग्धुं ज्वलितेवादृगात्मनः ॥507॥
अर्थादज्ञानिनो भीतिर्भीतिर्न ज्ञानिनः क्वचित् ।
यतोऽस्ति हेतुतः शेषाद्विशेषश्चानयोर्महान् ॥508॥
अज्ञानी कर्मनोकर्मभावकर्मात्मकं च यत् ।
मनुते सर्वमेवैतन्मोहादद्वैतवादवत् ॥509॥
विश्वाद्भिन्नोऽपि विश्वं स्वं कुर्वन्नात्मानमात्महा ।
भूत्वा विश्वमयो लोके भयं नोज्झति जातुचित् ॥510॥
तात्पर्यं सर्वतोऽनित्ये कर्मणः पाकसम्भवात् ।
नित्यबुद्ध्या शरीरादौ भ्रान्तो भीतिमुपैति सः ॥511॥
सम्यग्दष्टि: सदैकत्वं स्वं समासादयन्निव ।
यावत्कर्मातिरिक्तत्वाच्छुद्ध मत्येति चिन्मयम् ॥512॥
शरीरं सुखदुःखादि पृत्रपौत्रादिकं तथा ।
अनित्यं कर्मकार्यत्वादस्वरूपमवैति सः ॥513॥
लोकोऽयं मे हि चिल्लोको नूनं नित्योऽस्ति सोऽर्थतः ।
नापरोऽलौकिको लोकस्ततो भीतिः कुतोऽस्ति मे ॥514॥
स्वात्मसञ्चेतनादेवं ज्ञानी ज्ञानैकतानतः ।
इह लोकभयान्मुक्तो मुक्तस्तत्कर्मबन्धनात् ॥515॥
अन्वयार्थ : इस जन्म में मेरे इष्ट-पदार्थ का वियोग न हो जाय और अनिष्ट-पदार्थ का संयोग न हो जाय ऐसा विलाप करना इहलोक भय है ॥५०६॥
न जाने यह धन स्थिर रहेगा या नहीं, दैव-योग से कहीं दरिद्रता प्राप्त न हो जाय इत्यादि रूप से मानसिक व्यथारूपी चिता मिथ्यादृष्टि को जलाने के लिये सदैव जलती रहती है ॥५०७॥
तात्पर्य यह है कि भय अज्ञानी जीव के ही होता है ज्ञानी जीव के कभी भी भय नहीं होता, क्योंकि यह बात परिशेष न्याय से ज्ञात होती है कि ज्ञानी और अज्ञानी जीव में बड़ा अन्तर है ॥५०८॥
यतः अज्ञानी जीव कर्म, नोकर्म और भावकर्ममय है अतः वह इस सबको मोहवश अद्वैतवाद के समान अपने से अभिन्न मानता है ॥५८६॥
वह आत्मघाती विश्व से भिन्न होकर भी अपने आत्मा को विश्वमय मान बैठा है और इस प्रकार वह विश्वमय होकर लोक में कभी भी भय से मुक्त नहीं हो पाता ॥५१०॥
तात्पर्य यह है कि यद्यपि शरीरादि सर्वथा अनित्य हैं तो भी वह मिथ्यात्व कर्म के उदय से इनमें नित्य-बुद्धि रख कर भ्रान्त हो रहा है जिससे वह भय को प्राप्त होता है ॥५११॥
किन्तु सम्यग्दृष्टि जीव सदा ही अपने आत्मा में एकत्व का अनुभव करता है । वह उसे सब कर्मों से भिन्न, शुद्ध और चिन्मय मानता है ॥५१२॥
वह शरीर, सुख, दुःख, पुत्र और पौत्र आदिक को अनित्य मानता है और कर्म-जन्य होने से इन्हें आत्मा का स्वरूप नहीं मानता ॥५१३॥
वह ऐसा विचार करता है कि यह चैतन्य-लोक ही मेरा लोक है । वह वास्तव में नित्य है । इससे भिन्न अलौकिक लोक नहीं है इसलिये मुझे भय कैसे हो सकता है ॥५१४॥
इस प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव को अपने आत्मा का अनुभव होने के कारण ज्ञानानन्द में लीन रहता है । जिससे वह इस लोक सम्बन्धी भय से सदा मुक्त रहता है और इसके कारण-भूत कर्म-बन्धन से भी अपने को मुक्त अनुभव करता है ॥५१५॥