
मूर्तिमद्देहनिर्मुक्तो लोको लोकाग्रसंस्थितः ।
ज्ञानाध्यष्टगुणोपेतो निष्कर्मा सिद्धसंज्ञक: ॥608॥
अर्हन्निति जगत्पूज्यो जिनः कर्मारिशातनात् ।
महादेवोऽघिदेवत्वाच्छङ्करोऽपि सुखावहात् ॥609॥
विष्णुर्ज्ञानेन सर्वार्थविस्तृतत्वात्कथंचन ।
ब्रह्मा ब्रह्मज्ञरूप्तवाद्धरिर्दु:खापनोदनात् ॥610॥
इत्याद्यनेकनामापि नानेकोऽस्ति स्वलक्षणात् ।
यतोऽनन्तगुणात्मैकद्रव्यं स्यात्सिद्धसाधनात् ॥611॥
चतुर्विंशतिरित्यादि यावदन्तमनन्तता ।
तद्धहुत्वं न दोषाय देवत्वैकविधत्वतः ॥612॥
प्रदीपानामनेकत्वं न प्रदीपत्वहानये ।
यतोऽत्रैकविधत्वं स्यान्न स्यान्नानाप्रकारता ॥613॥
न चाशंक्यं यथासंख्यं नामतोऽप्यस्त्वनन्तधा ।
न्यायादेकं गुणं चैकं प्रत्येकं नाम चैककम् ॥614॥
नामतो सर्वतो मुख्यसंख्यातस्यैव सम्भवात् ।
अधिकस्य ततो वाचाऽव्यवहारस्य दर्शनात् ॥615॥
अन्वयार्थ : जो मूर्त शरीर से रहित है; सम्पूर्ण चर और अचर पदार्थों को युगपत् जानने और देखनेवाला है, लोक के अग्रभाग में स्थित है, ज्ञानादि आठ गुण सहित है और ज्ञानावरणादिक आठ कर्मों से रहित है वह सिद्धदेव है ॥६८८॥
यह देव जगत्पूज्य है इसलिये [[अर्हत]] कहलाता है, कर्मरूपी शत्रुओं का नाश कर दिया है इसलिए [[जिन]] कहलाता है, सब देव इससे नीचे हैं, इसलिये [[महादेव]] कहलाता है, सुख देनेवाला है इसलिये [[शंकर]] कहलाता है , ज्ञान द्वारा कर्थंचित् सब पदार्थों में व्याप रहा है इसलिये [[विष्णु]] कहलाता है, ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञाता है इसलिये [[ब्रह्म]] कहलाता है और दुःखों का हरण करने वाला है इसलिये [[हरि]] कहलाता है । इस प्रकार यद्यपि उसके अनेक नाम हैं तथापि वह अपने लक्षण की अपेक्षा अनेक नहीं है , क्योंकि वह साधनों से भले प्रकार सिद्ध अनन्त गुणात्मक एक ही द्रव्य हैं । यद्यपि चौबीस तीर्थंकरों से लेकर अन्त तक विचार करने पर व्यक्तिरूप से देव अनन्त हैं, तथापि यह देवों का बहुत्व दोषधायक नहीं है , क्योंकि इन सबमें एक प्रकार का ही देवत्व पाया जाता है ॥६८९-६१०॥ जिस प्रकार दीपक अनेक हैं तो भी उस से प्रदीप सामान्य की हानि नहीं होती, क्योंकि जितने भी दीपक हैं वे सब एक ही प्रकार के पाये जाते हैं नाना प्रकार के नहीं । उसी प्रकार व्यक्तिरूप से देवों के अनेक होने पर भी कोई हानि नहीं हैं, क्योंकि देवत्व सामान्य की अपेक्षा सब देव एक हैं ॥६१३॥ यदि कोई ऐसी आशंका करे कि नाम की अपेक्षा क्रम से देव के अनन्त भेद रहे आवें, क्योंकि न्यायानुसार एक-एक गुण की अपेक्षा एक-एक नाम रखा जा सकता है सो ऐसी आशंका करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार नाम की अपेक्षा देव के मुख्य रूप से संख्यात भेद ही सम्भव हैं, क्योंकि वचन व्यवहार इससे अधिक नहीं दिखाई देता है ॥६१४-६१५॥