वृद्धै: प्रोक्तमतःसूत्रे तत्त्वं वागतिशायि यत्‌ ।
द्वादशाङ्गाङ्गबाह्यं वा श्रुतं स्थूलार्थगोचरम्‌ ॥616॥
कृत्स्नकर्मक्षयाज्ज्ञानं क्षायिकं दर्शनं पुनः ।
अत्यक्षं सुखमात्मोत्थं वीर्यंचेति चतुष्टयम् ॥617॥
सम्यक्त्वं चैव सूक्षमत्वमव्याबाधगुणः स्वतः ।
अस्त्यगुरुलघुत्वं च सिद्धेचाष्टगुणा: स्मृताः ॥618॥
इत्याद्यनन्तधर्माढ्यो कर्माष्टकविवर्जित: ।
मुक्तोऽष्टादशभिर्दोषैर्देव: सेव्यो न चेतरः ॥619॥
अर्थाद्‌गुरु: स एवास्ति श्रेयोमार्गोपदेशक: ।
आप्तश्चैव स्वत: साक्षान्नेता मोक्षस्य वर्त्मनः ॥620॥
अन्वयार्थ : इसी से पू्वाचार्यों ने सूत्र में यह कहा है कि तत्त्व वचन के अगोचर है और बारह अंग तथा अंगबाह्यरूप श्रुत स्‍थूल अर्थ को विषय करता है ॥६१६॥ सम्पूर्ण कर्मों के क्षय से सिद्ध के ये आठ गुण होते हैं; क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, अतीन्द्रिय सुख और आत्म से उत्पन्न होने वाला वीर्य ये चार अनन्त चतुष्टय होते हैं । इनके सिवा सम्यकत्व, सूक्ष्मत्व, अव्याबाध और अगुरुलघु ये चार गुण और होते हैं ॥६१७-६१८॥ इस प्रकार जो ज्ञानादि अनन्त धर्मों से युक्त है, आठ कर्मों से रहित है, मुक्त है और अठारह दोषों से रहित है वही देव सेवनीय है अन्य नहीं ॥६१९॥ वास्तव में वही देव सच्चा गुरु है, वही मोक्ष-मार्ग का उपदेशक है, वही भगवान है और वही मोक्ष-मार्ग का साक्षात् नेता है ॥६२०॥