
तेभ्योऽर्वागपि छद्मस्थरूपास्तद्रूपधारिणः ।
गुरवः स्युर्गुरोर्न्यायान्न्योऽवस्थाविशेषभाक् ॥621॥
अस्त्यवस्थाविशेषोऽत्र युक्तिस्वानुभवागमात् ।
शेषसंसारिजीवेभ्यस्तेषामेवातिशायनात् ॥622॥
भाविनैगमनयायत्तो भूष्णुस्तद्वानिवेष्यते ।
अवश्यं भावतो व्याप्तेः सद्भावात्सिद्धसाधनम् ॥623॥
अस्ति सद्दर्शनं तेषु मिथ्याकर्मोपशान्तितः ।
चारित्रं देशतः सम्यक् चारित्रावरणक्षतेः ॥624॥
ततः सिद्धं निसर्गाद्वै शुद्धत्त्वं हेतुदर्शनात् ।
मोहकर्मोदयाभावात्तत्कार्यस्याऽप्यसम्भवात्॥। 624॥
तच्छुद्धत्वं सुविख्यातं निर्जराहेतुरञ्जसा ।
निदानं संवरस्यापि क्रमान्निर्वाणभागपि ॥626॥
अन्वयार्थ : इन अरहंत और सिद्धों से नीचे भी जो अल्पज्ञ हैं और उसी रूप अर्थात् दिगम्बरत्व, वीतरागत्व और हितोपदेशत्व को धारण करनवाले है वे गुरु हैं. क्योंकि इनमें न्यायानुसार गुरु का लक्षण पाया जाता है । ये उनसे भिन्न और कोई दूसरी अवस्था को धारण करनेवाले नहीं हैं ॥६२१॥ इनमें अवस्था विशेष पाई जाती है यह बात युक्त, अनुभव और आगम से सिद्ध है , क्योंकि उनमें शेष संसारी जीवों से कोई विशेष अतिशय देखा जाता है ॥६२२॥ भावि नैगमनय की अपेक्षा से जो होने वाला है, वह उस पर्याय से युक्त की तरह कहा जाता है, क्योंकि उसमें नियम से भाव की व्याप्ति पाई जाती है इसलिये ऐसा कहना युक्तियुक्त है ॥६२२॥ उनमें दर्शन मोहनीय कर्म की उपशांति हो जाने से सम्यगदर्शन भी पाया जाता है और चारित्रावरण कर्म का एकदेश क्षय हो जाने से सम्यक्चारित्र भी पाया जाता है ॥६२४॥ इसीलिए उनमें स्वभाव से ही शुद्धता सिद्ध होती है और इसकी पुष्टि करनेवाला हेतु भी पाया जाता है । यत: उनके मोहनीय कर्म का उदय नहीं है अतः वहां मोहनीय कर्म का कार्य भी नहीं पाया जाता है ॥६२५॥ इनकी यह शुद्धता नियम से निर्जरा का कारण है , संवर का कारण है और क्रम से मोक्ष दिलाने वाली है -- यह बात सुप्रसिद्ध है ॥६२६॥