यद्वा स्वयं तदेवार्थान्निर्जरादित्रयं यतः ।
शुद्धभावाविनाभावि द्रव्यनामापि तत्‌ त्रयम ॥627॥
निर्जरादिनिदानं यः शुद्धो भावश्चिदात्मनः ।
परमार्ह: स एवास्ति तद्वानात्मा परं गुरु: ॥628॥
न्‍यायाद्‌ गुरुत्वहेतुः स्यात् केवलं दोष संक्षयः ।
निर्दोषो जगतः साक्षी नेता मार्गस्य नेतर: ॥620॥
नालं छद्मस्थताप्येषा गुरुत्वक्षतये मुनेः ।
रागाद्यशुद्धभावनां हेतुर्मोहैककर्म तत्‌ ॥630॥
अन्वयार्थ : अथवा वह शुद्धता ही नियम से स्वयं निर्जरा आदि तीन रूप है, क्योंकि शुद्ध भावों से अविनाभाव रखनेवाला द्रव्य इन तीन रूप ही होता है ॥६२७॥ आशय यह है कि आत्मा का जो शुद्ध भाव निर्जरा आदि का कारण है वही परम पूज्य है और उससे युक्त आत्मा ही परम गुरु है ॥६२८॥ न्यायानुसार गुरुपने का कारण केवल दोषों का नाश हो जाना ही है । जो निर्दोष है, वही जग का साक्षी है और वही मोक्ष-मार्ग का नेता है अन्य नहीं ॥६२९॥ मुनि की यह छद्मस्थता भी गुरुपने का नाश करने के लिए समर्थ नहीं है, क्योंकि रागादि अशुद्ध भावों का कारण एक मोह-कर्म माना गया है ॥६३०॥