+ प्रश्न -- कर्म के सद्भाव में छद्मस्थ के शुद्धता कैसे ? -
नन्वावृतिद्वयं कर्म वीर्यविध्वंसि कर्म च ।
अस्ति तत्राप्यवश्यं वै कुतः शुद्धत्वमत्र चेत् ॥631॥
अन्वयार्थ : छद्मस्थ गुरुओं में दोनों आवरण कर्म और वीर्य का नाश करनेवाला अन्तराय कर्म नियम से है, इसलिये उनमें शुद्धता कैसे हो सकती है ?