
सत्यं किन्तु विशेषोऽस्ति प्रोक्तकर्मत्रयस्य च ।
मोहकर्माविनाभूतं बन्धसत्त्वोदयक्षयम् ॥632॥
तद्यथा बध्यमानेऽस्मिस्तद्वन्धो मोहबन्धसात् ।
तत्सत्त्वे सत्तवमेतस्य पाके पाकः क्षये क्षय: ॥633॥
नोहयं छाद्मस्थावस्थायामरर्वागेवास्तु तत्क्षय: ।
अंशान्मोहक्षयस्यांशात्सर्वत: सर्वत: क्षय: ॥634॥
नासिद्धं निर्जरातत्त्वं सद्-दृष्टे: कृत्स्नकर्मणाम् ।
आदृङ्मोहोदयाभावात्तच्चासंख्यगुणम् क्रमात् ॥635॥
ततः कर्मत्रयं प्रोक्तमस्ति यद्यपि साम्प्रतम ।
रागद्वेषविमोहानामभावाद्गुरुता मता ॥636॥
अन्वयार्थ : यह बात ठीक है किन्तु इतनी विशेषता है कि उक्त तीनों कर्मों का बन्ध, सत्त्व, उदय और क्षय मोहनीय कर्म के साथ अविनाभावी है ॥६३१-६३२॥ खुलासा इस प्रकार है कि मोहनीय का बन्ध होने पर उसके साथ-साथ ज्ञानावरणादि कर्मों का बन्ध होता है । मोहनीय का: सत्त्व रहते हुए इनका सत्त्व रहता है, मोहनीय का पाक होते समय इनका पाक होता है और मोहनीय का क्षय होने पर इनका क्षय होता है ॥६३३॥ यदि कोई ऐसी आशंका करे कि छदमस्थ अवस्था में ज्ञानावरणादि कर्मों का क्षय होने के पहले ही मोहनोय का क्षय हो जाता है, सो ऐसी आशंका करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि मोहनीय का एकदेश क्षय होने से इनका एकदेश क्षय होता है और मोहनीय का सर्वथा क्षय होने से इनका भी स्वत: क्षय हो जाता है ॥६३४॥ सम्यग्दृष्टि के समस्त कर्मों की निर्जरा होती है यह बात असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि दर्शन-मोहनीय के उदय का अभाव होने पर वहां से लेकर वह उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी होने लगती है ॥६३५॥ इसलिये छदमस्थ गुरुओं के यद्यपि वर्तमान में तीनों कर्मों का सद्भाव कहा गया है । तथापि राग, द्वेष और मोह का अभाव हो जाने से उनमें गुरुपना माना गया है ॥६३६॥