
अथास्त्यैक: स सामान्यात्सद्विशेषात् त्रिधा गुरु: ।
एकोऽप्यग्निर्यथा तार्ण्य: पर्ण्यो दार्व्यस्रिघोच्यते ॥637॥
आचार्य: स्यादुपाध्यायः साधुश्चेति त्रिधा मतः ।
स्युर्विशिष्टपदारूढास्त्रयोऽपि मुनिकुञ्जरा: ॥638॥
एको हेतु: क्रियाऽप्येका वेषश्चैको बहि: समः ।
तपो द्वादशधा चैकं व्रतं चैकं च पश्चधा ॥639॥
त्रयोदशविधं चैकं चारित्रं समतैकधा ।
मूलोत्तरगुणाश्चैके संयमोऽप्येकधा मतः ॥640॥
परीषहोपसर्गाणां सहनं च समं स्मृतम् ।
आहारादिविधिश्चैकश्चर्यास्थानासनादय:॥641॥
मार्गो मोक्षस्य सद्-दृष्टि ज्ञानं चारित्रमात्मनः ।
रत्नत्रयं समं तेषामपि चान्तर्बही: स्थितम् ॥642॥
ध्याता ध्यानं च ध्येयं च ज्ञाता ज्ञानं च ज्ञेयसात् ।
चतुर्धाऽऽराधना चापि तुल्या क्रोधादिजिष्णुता ॥643॥
किं वात्र बहुनोक्तेन तद्विशेषोऽवशिष्यते ।
विशेषाऽच्छेशनिःशेषो न्यायादस्त्यविशेषभाक् ॥644॥
अन्वयार्थ : वह गुरु सामान्य रूप से एक प्रकार का और अवस्था विशेष की अपेक्षा से तीन प्रकार का माना गया है । जैसे अग्नि यद्यपि एक ही है तो भी वह तिनके की अग्नि, पत्ते की अग्नि और लकड़ी की अग्नि इस तरह तीन प्रकार की कही जाती है, वेसे ही प्रकृत में जानना चाहिये ॥६३७॥ इनके ये भेद आचार्य, उपाध्याय और साधु ये तीन हैं । ये तीनों ही मुनिकुञ्जर यद्यपि अपने-अपने विशेष-पद पर स्थित हैं ॥६३८॥ तथापि इनके मुनि होने का कारण एक है; क्रिया एक है, बाह्य भेष एक-सा है; बारह प्रकार का ताप एक-सा है; पांच प्रकार का व्रत एक-सा है; तेरह प्रकार का चारित्र एक-सा है; समता एक-सी है; मूल और उत्तर गुण भी एक-से हैं; संयम भी एक-सा है; परीषह और उपसर्गों का सहन करना भी एक-सा है; आहार आदि की विधि भी एक-सी है; चर्या, स्थान और आसन आदि भी एक-से हैं; मोक्ष का मार्ग जो सम्यग्दर्शन, सम्यगज्ञान, और सम्यक्चारित्र रूप आत्मीक रत्नत्रय है, वह भी उनके भीतर और बाहर समान है । इसी प्रकार ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार प्रकार की आराधनाएँ और क्रोधादिक का जीतना, ये भी समान हैं ॥६४०-६४३॥ इस विषय में बहुत कहां तक कहें, उनका जो कुछ विशेष है वही कहना बाकी है, क्योंकि विशेष से जो भी शेष रह जाता है वह न्यायानुसार अविशेष कहलाता है ॥६४४॥