
आचार्योऽनादितो रूढेर्योगादपि निरुच्यते ।
पञ्चाचारं परेभ्यः स आचारयति संयमी ॥645॥
अपि छिन्ने व्रते साधोः पुनः सन्धानमिच्छतः ।
तत्समादेशदानेन प्रायश्चित्तं प्रयच्छति ॥646॥
आदेशस्योपदेशेभ्य: स्याद्विशेषः स भेदभाक् ।
आददे गुरुणा दत्तं नोपदेशेष्वयं विधिः ॥647॥
न निषिद्धस्तदादेशो गृहिणां व्रतधारिणाम् ।
दीक्षाचार्येण दीक्षेव दीममानास्ति तत्क्रिया ॥648॥
स निषिद्धो यथाम्नायादव्रतिनां मनागपि ।
हिंसकश्चोपदेशोऽपि नोपयुज्योऽत्र कारणात् ॥649॥
मुनिव्रतधराणां वा गृहस्थव्रतधारिणाम् ।
आदेशश्चोपदेशो वा न कर्तव्यो वधाश्रितः ॥650॥
न चाशंक्यं प्रसिद्धं यन्मुनिभिर्व्रतधारिभिः ।
मूर्तिमच्छक्तिसर्वस्वं हस्तरेखेव दर्शितम् ॥651॥
नूनं प्रोक्तोपदेशोऽपि न रागाय विरागिणाम् ।
रागिणामेव रागाय ततोऽवश्यं निषेधितः ॥652॥
अन्वयार्थ : अनादिकालीन रूढि और निरुत्त्यर्थ इन दोनों की अपेक्षा से आचार्य शब्द का यह अर्थ लिया जाता है कि जो संयमी दूसरों से पाँच आचार का आचरण कराता है, वह आचार्य है ॥६४५॥ तथा व्रत-भंग होने पर फिर से उस व्रत को जोड़ने की इच्छा करने वाले साधु को जो आदेश द्वारा प्रायश्चित देता है, वह आचार्य है ॥६४६॥ उपदेशों से आदेश में पार्थक्य दिखलाने वाला यह अन्तर है कि आदेश में 'मैं गुरु के द्वारा दिये गये व्रत को स्वीकार करता हूं?' यह विधि मुख्य रहती है किन्तु उपदेशों में यह विधि मुख्य नहीं रहती ॥६४७॥ व्रतधारी गृहस्थों के लिए भी आचार्य का आदेश करना निषिद्ध नहीं है, क्योंकि दीक्षाचार्य के द्वारा दी गई दीक्षा के समान ही वह आदेशधि मानी गई है ॥६४८॥ किन्तु जो अव्रती हैं उनके लिये आगम की परिपाटी के अनुसार थोड़ा भी आदेश करना निषिद्ध है और इसी प्रकार कारणवश हिंसाकारी उपदेश करना भी उपयुक्त नहीं है ॥६४९॥ चाहे मुनिव्रत धारी हों और चाहे गृहस्थव्रत धारी हो इन दोनों के लिये हिंसा का अवलम्बन करने वाला आदेश और उपदेश नहीं करना चाहिये ॥६५०॥ जो यह प्रसिद्ध है कि व्रत-धारी मुनि मूर्तिमान् पदार्थों की समस्त शक्तियों को हस्तरेखा के समान दिखला देते हैं इसलिये उक्त उपदेश और आदेश उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सकता सो ऐसी आशंका करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि पूर्वोक्त उपदेश विरागियों के लिये राग का कारण नहीं है तो भी जो रागी हैं उनके लिए राग का कारण अवश्य है इसलिए उसका निषेध किया गया है ॥६५१-६५२॥