न निषिद्धः स आदेशो नोपदेशो निषेधितः ।
नूनं सत्पात्रदानेषु पूजायामर्हतामपि ॥653॥
यद्वादेशोपदेशौ स्तो तौ द्वौ निरवद्यकर्मणि ।
यत्र सावद्यलेशोऽस्ति तत्रादेशो न जातुचित्‌ ॥654॥।
सहासंयमिभिर्लोकै: संसर्ग भाषणं रतिम् ।
कुर्यादाचार्य इत्येके नासौ सूरिर्न चार्हतः ॥655॥
संघसम्पोषकः सूरिः प्रोक्तः कैश्चिन्मतेरिह ।
धर्मादेशोपदेशाभ्यां नोपकारोऽपरोस्त्यतः ॥656॥
यद्वा मोहात्‌ प्रमादाद्वा कुर्याद्यो लौकिकीं क्रियाम्‌ ।
तावत्कालं स नाचार्योऽप्यरित चान्तर्व्रताच्च्युतः ॥657॥
उक्तव्रततपःशीलसंयमादिघरो गणी ।
नमस्य: स गुरु: साक्षात्तदन्यो न गुरुर्गणी ॥658॥
अन्वयार्थ : किन्तु सत्पात्रों के लिये दान और अरहंतों की पूजा, इन कार्यों में न तो वह आदेश ही निषिद्ध है और न वह उपदेश ही निषिद्ध है ॥६०५३॥ अथवा आदेश और उपदेश ये दोनों ही निर्दोष कार्यों के विषय में उचित माने गये हैं, क्योंकि जिस कार्य में सावद्य का लेशमात्र भी हो उस कार्य का आदेश करना कभी भी उचित नहीं है ॥६५४॥ कितने ही आचार्यों का मत है कि आचार्य असंयमी पुरुषों के साथ सम्बन्ध, भाषण और प्रीति कर सकता है परन्तु उनका ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा करने वाला न तो आचार्य ही हो सकता है और न अरहन्त के मत का अनुयायी ही हो सकता है ॥६०५॥ जो संघ का पालन-पोषण करता है, वह आचार्य है ऐसा किन्हीं अन्य लोगों ने ही अपनी मति से कहा है अतः यही निश्चय होता है कि धर्म का आदेश और उपदेश के सिवा आचार्य का और कोई दूसरा उपकार नहीं है ॥६५६॥ अथवा मोह-वश या प्रमाद-वश हो कर जो लौकिकी-क्रिया को करता है, वह उतने काल तक आचार्य नहीं रहता; इतना ही नहीं किन्तु तब वह अन्तरंग में व्रतों से च्युत हो जाता है ॥६५७॥ इस प्रकार पूर्वोक्त व्रत, तप, शील और संयम आदि को धारण करनेवाला आचार्य ही नमस्कार करने योग्य है और वही साक्षात्‌ गुरु है । इससे भिन्‍न स्वरूप का घारण करने वाला न तो गुरु ही हो सकता है और न आचार्य ही हो सकता है ॥६५८॥