+ उपाध्याय का स्वरूप -
उपाध्याय: समाधीयान्‌ वादी स्थाद्वादकोविद: ।
वाग्मी वाग्ब्रह्मसर्वज्ञ: सिद्धान्तागमपारगः ॥659॥
कविर्व्रत्त्यग्रसूत्राणां शब्दा्र्थै: सिद्धसाधनात्‌ ।
गमकोऽर्थस्य माधुर्ये धुर्यो वक्‍तृत्ववर्मनाम् ॥660॥
उपाध्यायत्वमित्यत्र श्रुताभ्यासोऽस्ति कारणम्‌ ।
यदध्येति स्वयं चापि शिष्यानध्यापयेद्गुरु: ॥661॥
शेषस्तत्र व्रतादीनां सर्वसाधारणो विधिः ।
कुर्याद्धर्मोपदेशं स नादेशं सूरिवत्क्वचित्‌ ॥662॥
तेषामेवाश्रमं लिङ्गं सूरीणां संयमं तपः ।
आश्रयेच्छुद्धचारित्रं पञ्चाचारं स शुद्धधी: ॥663॥
मूलोत्तरगुणानेव यथोक्तानाचरेच्चिरम् ।
परीषहोपसर्गाणां विजयी स भवेद्वशी ॥664॥
अत्रातिविस्तरेणालं नूनमन्तर्बहिर्मुनेः ।
शुद्धवेषधरो धीमान्‌ निर्ग्रन्थः स गणाग्रणी ॥665॥
अन्वयार्थ : समाधान करने वाला, वाद करने वाला, स्यादवाद विद्या का जानकार, वाग्मी, वचन ब्रह्म में पारंगत, सिद्धान्त शासत्र का पारगामी, वृत्ति तथा मुख्य सूत्रों का शब्द और अर्थ के द्वारा सिद्ध करने वाला होने से कवि, अर्थ की मधुरता का ज्ञान करने वाला और वक्‍तृत्व कला में अग्रणी उपाध्याय होता है ॥६५९-६६०॥ उपाध्याय होने में मुख्य कारण श्रुत का अभ्यास है । जो स्वयं पढ़ता है और शिष्यों को पढ़ाता है वह उपाध्याय है ॥६६१॥ उपाध्याय की व्रतादिक सम्बन्धी शेष सब विधि मुनियों के समान होती है । यह धर्म का उपदेश कर सकता है किन्तु आचार्य के समान किसी को आदेश नहीं कर सकता ॥६६२॥ शुद्ध बुद्धिवाला वह उन्ही आचार्यों के आश्रम में रहता है । उन्हीं के संयम, तप, शुद्ध चारित्र और पंचाचार का पालन करता हैं ॥६६३॥ वह चिरकाल तक शास्त्रोक्त-विधि से मूल-गुणों और उत्तर-गुणों का पालन करता है । परीषह और उपसर्गों को जीतनेवाला होता है तथा जितेन्द्रिय होता है ॥६६४॥ यहां पर अधिक विस्तार करना व्यर्थ है, किन्तु इतना ही कहना पर्याप्त है कि वह अन्तरंग और बहिरंग दोनों प्रकार से मुनि के शुद्ध वेष को धारण करने वाला, बुद्धिमान्‌, निर्ग्रन्थ और गण में प्रधान होता है ॥६६५॥