+ साधु का स्वरूप -
उपाध्याय: समाख्यातो विख्यातोऽस्ति स्वलक्षणे: ।
अधुना साध्यते साधोर्लक्षणं सिद्धमागमात्‌ ॥666॥
मार्गं मोक्षस्य चारित्रं सद्-दृग्ज्ञप्तिपुर: सरम् ।
साधयत्यात्मसिद्ध्यर्थं साधुरन्वर्थसंज्ञक: ॥667॥
नोच्याच्चायं यमी किश्चिद्धस्तंपादादिसंज्ञया ।
न किश्चिदर्शयेत्स्वस्थो मनसापि न चिन्तयेत्‌ ॥668॥
आस्ते स शुद्धमात्मानमास्तिध्नुवानश्च परम्‌ ।
स्तिमिन्तान्तर्बहिस्तुल्यो निस्तङ्गाब्धिवन्मुनि: ॥669॥
नादेशं नोपदेशं वा नादिशेत्‌ स मनागपि ।
स्वर्गापवर्गमार्गस्य तद्विपक्षस्य किं पुन: ॥670॥
वैराग्यस्य परां काष्टामधिरूठोऽधिकप्रभ: ।
दिगम्बरो यथाजातरूपधारी दयापरः ॥671॥
निर्ग्रंथोन्तर्बहिर्मोंहग्रन्थेरुद्ग्रंथको यमी ।
कर्मनिर्जरकः श्रेण्या तपस्वी स तपोंशुभि: ॥672॥
परीषहोपसर्गाद्यैरजय्यो जितमन्मथः ।
एषणाशुद्धिसंशुद्ध: प्रत्याख्यानपरायणः ॥673॥
इत्याद्यनेकधाऽनेकै: साधु: साधुगुणै: श्रितः ।
नमस्य: श्रेयसेऽवश्यं नेतरो विदुषां महान्‌ ॥674॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार अपने लक्षणों से प्रसिद्ध उपाध्याय का स्वरूप कहा । अब साधु के लक्षण का विचार करते हैं जो कि आगम में भली-भांति सिद्ध है ॥६६६॥ मोक्ष का मार्ग सम्यग्दर्शन पूर्वक सम्यक्चारित्र है । जो आत्मसिद्धि के लिये इसका साधन करता है, वह साधु है । यह इसका सार्थक नाम है ॥६६७॥ यह साधु स्वस्थ रहता है इसलिये न तो कुछ कहता है , न हाथ पैर आदि से किसी प्रकार का इशारा करता है और न मन से ही कुछ विचार करता है। ६६८ । किन्तु वह मुनि केवल शुद्ध आत्मा में लीन रहता है, अन्तरंग और बहिरंग जल्प से रहित हो जाता है और तंरंग रहित समुद्र के समान शान्त रहता है॥६६९॥वह स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग का थोड़ा भी न तो आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है फिर विपक्ष का तो कर ही कैसे सकता है ॥६७०॥ वैराग्य की चरम सीमा को प्राप्त, अधिक प्रभावान्‌, दिगम्बर जन्म के समय जैसा रूप होता है वैसे रूप को धारण करनेवाला, दया शील, निर्ग्रन्थ , अन्तरंग और बहिरंग मोह की गांठ को खोलनेवाला, व्रतों को जीवन पर्यंत पालनेवाला, गुणश्रेणिरूप से कर्मों की निर्जरा करनेवाला, तपरूपी किरणों द्वारा तपने से तपस्वी, परीषह और उपसर्ग आदि से अजेय, काम को जीतने वाला, शास्त्रोक्त विधि से आहार लेने वाला और प्रत्याख्यान में तत्पर इत्यादि अनेक प्रकार के साधु के योग्य अनेक गुणों को धारण करने वाला साधु होता है । ऐसा साधु कल्याण के लिये नियम से नमस्कार करने योग्य है; इससे विपरीत कोई यदि विद्वानों में श्रेष्ठ भी हो तो वह नमस्कार करने योग्य नहीं है ॥६७१-६७४॥