
एवं मुनित्रयी ख्याता महती महतामपि ।
तथापि तद्विशेषोऽस्ति क्रमात्तरमात्मक: ॥674॥
तत्राच्चार्य: प्रसिद्धोऽस्ति दीक्षादेशाद्गणाग्रणीः ।
न्यायाद्वादेशतोऽध्यक्षात्सिद्ध स्वात्मनि तत्पर: ॥676॥
अर्थान्नातत्परोऽप्येष दृङ्मोहानुदयात्सत: ।
अस्ति तेनाविनाभूतः शुद्धात्मानुभवः स्फुटम् ॥677॥
अप्यस्ति देशतस्तत्र चारित्रावरणक्षतिः ।
ब्रह्मार्थात् केवलं न स्यात्क्षतिर्वा च तदक्षति: ॥678॥
अस्त्युपादानहेतोश्च तत्क्षतिर्वा तदक्षतिः ।
तदापि न बहिर्वस्तु स्यात्तद्धेतुरहेतुतः ॥679॥
सन्ति संज्वलनस्योच्चै: स्पर्धका देशघातिनः ।
तद्विपाकोऽस्त्यमन्दो वा मन्दो हेतुः क्रमाद् द्वयो: ॥680॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार यद्यपि श्रेष्ठ में भी श्रेष्ठ इन तीन प्रकार के मुनियों का व्याख्यान किया । तथापि उनमें तरतमरूप कुछ विशेषता पाई ज्ञाती है ॥६७५॥ वह इस प्रकार है -- उन तीनों में जो दीक्षा और आदेश देता है वह गण का अग्रणी आचार्य है । यह अपनी आत्मा में लीन रहता है यह बात युक्ति आगम और अनुभव से सिद्ध है ॥६७६॥ इसके दर्शन-मोहनीय का अनुदय होता है इसलिये यह वास्तव में अपनी आत्मा में अतत्पर नहीं है । किन्तु इसके उससे अविनाभाव सम्बन्ध रखनवाला शुद्ध-आत्मा का अनुभव नियम से पाया जाता है ॥६७७॥ दूसरे इसके चारित्र-मोहनीय का एकदेश क्षय भी पाया जाता है । क्योंकि चारित्र की हानि और लाभ केवल बाह्य पदार्थ के निमित्त से नहीं होता है ॥६७८॥ किन्तु उपादान कारण के बल से चारित्र की हानि या उसका लाभ होता है । तब भी अहेतु होने से बाह्य-वस्तु उसका कारण नहीं है ॥६७९॥ वास्तव में
संज्वलन कषाय के जो देशघाति स्पर्धक पाये जाते हैं उनका तीव्र और मन्द उदय ही क्रम से चारित्र की क्षति और अक्षति का कारण है ॥६८०॥