
संक्लेशस्तत्ज्ञतिर्नूनं विशिद्धिस्तु तदक्षतिः ।
सोऽपि तरतमांशांशै: सोऽप्यनेकैरनेकधा ॥681॥
अस्तु यद्वा न शैथिल्यं तत्र हेतुवशादिह ।
तथाप्येतावताचार्य: सिद्धो नात्मन्यतत्परः ॥682॥
तत्रावश्यं विशुद्धयंशस्तेषां मन्दोदयादिति ।
संक्लेशांशोऽथवा तीव्रोदयान्नायं विधि: स्मृत: ॥683॥
किन्तु दैवाद्विशुद्ध्यंश: संक्लेशांशोऽथवा क्वचित् ।
तद्विशुद्धेर्विशुद्ध्यंश: सक्लेशांशोदयः पुनः ॥684॥
तेषां तीव्रोदयात्तावदेतावानत्र बाधकः ।
सर्वतश्चेत्प्रकोपाय नापराधोऽपरोऽस्त्यतः ॥685॥
तेनात्रैतावता नूनं शुद्धस्यानुभवच्युतिः ।
कर्त्तुं न शक्यते यस्मादत्रास्त्यन्यः प्रयोजकः ॥686॥
हेतुः शुद्धात्मनो ज्ञाने शमो मिथ्यात्वकर्मण: ।
प्रत्यनीकस्तु तत्रोच्चैरशमस्तत्र व्यत्ययात् ॥687॥
दृङ्मोहेऽस्तंगते पुंसः शुद्धस्यानुभवो भवेत् ।
न भवेद्विघ्नकरः कश्चिचारित्रावरणोदयः ॥688॥
अन्वयार्थ : संक्लेश नियम से चारित्र की क्षति का कारण है और विशुद्धि चारित्र की क्षति का कारण नहीं है और वह संक्लेश तथा विशुद्धि भी अपने तरतमरूप अंशों की अपेक्षा अनेक प्रकार की है । और ये तरतमरूप अंश भी अपने अवान्तर भेदों की अपेक्षा अनेक प्रकार के हैं ॥६८१॥ अथवा कारणवश आचार्य के चारित्र में कदाचित् शिथिलता भी होवे और कदाचित् न भी होवे तो भी इतने मात्र से आचार्य अपनी आत्मा में अतत्पर हैं यह बात नहीं सिद्ध होती ॥६८२॥ उनके देशघाति स्पर्धकों के मन्द उदय होने से नियम से विशुद्धता होती है और देशघाति स्पर्धकों के तीव्र उदय होने से संक्लेश होता है यह विधि नहीं मानी गई है ॥६८३॥ किन्तु दैव-वश उनके कही पर विशुद्धयंश भी होता है और दैववश कहीं पर संक्लेश भी होता है । यदि चारित्र को विशुद्धि है तो विशुद्धंश होता है और फिर संक्लेशांश का उदय होता है ॥६८४॥ उन देशघाति स्पर्धकों का तीव्र-उदय तो केवल इतना ही आचार्य के बाघक है कि यदि वह सर्वथा प्रकोप का कारण है, ऐसा मान लिया जाय तो इस से बड़ा और कोई अपराध नहीं है ॥६८५॥ इसलिए यहाँ पर इतने मात्र से आचार्य के शुद्ध-अनुभव की च्युति नहीं की जा सकती, क्योंकि इसका कारण कोई दूसरा है ॥६८६॥ मिथ्यात्व-कर्म का अनुदय शुद्ध आत्मा के ज्ञान में कारण है और उसका तीव्र उदय उसमें बाधक है, क्योंकि मिथ्यात्व का उदय होने पर शुद्ध आत्मा के ज्ञान का विनाश देखा जाता है ॥६८७॥ दर्शन-मोहनीय का अभाव होने पर शुद्ध-आत्मा का अनुभव होता है इसलिये चारित्रावरण का किसी भी प्रकार का उदय उसका बाधक नहीं है ॥६८८॥