न चाकिन्चिकरश्चैवं चारित्रावरणोदयः ।
दृङ्मोहस्य कृतेनालं अलं स्वस्य कृते च तत्‌ ॥689॥
कार्यं चारित्रमोहस्य चारित्राच्च्युतिरात्मन: ।
नात्मद्रश्टेस्तु दृष्टित्वान्न्यायादितरदृष्टिवत्‌ ॥690॥
यथा चक्षु: प्रसन्नं वै कस्यचिद्दैवयोगतः ।
इतरत्राक्षतापेऽपि दष्टाध्यक्षान्न तत्क्षतिः ॥691॥
कषायाणामनुद्रेकश्चारित्रं तावदेव हि ।
नानुद्रेक: कषायाणां चारित्राच्च्युतिरात्मनः ॥692॥
ततस्तेषामनुद्रेकः स्यादुद्रेकोऽथवा स्वतः ।
नात्मदृष्टे: क्षतिर्नूनं दृङ्मोहस्योदयादृते ।
अथ सरिरूपाध्यायो द्वावेतौ हेतुतः समौ ।
साधू साधुरिवात्मज्ञौ शुद्धौ शुद्धोपयोगिनौ ॥694॥
नापि कश्चिद्विशेषोऽस्ति तयोस्तरतमो मिथ: ।
नैताभ्यामन्तरुत्कर्ष: साधोरप्यतिशायनात्‌ ॥695॥
लेशतोऽस्ति विशेषश्चेन्मिथस्तेषां बहिःकृत: ।
का क्षतिर्मूलहेतोः स्यादन्तःशुद्धे: समत्वतः ॥696॥
अन्वयार्थ : एतावता चारित्रावरण का उदय अकिंचित्कर है यह बात नहीं है क्योंकि यद्यपि वह दर्शन-मोहनीय का कार्य करने में असमर्थ है, तथापि वह अपना कार्य करने में अवश्य समर्थ है ॥६८५॥ चारित्र-मोहनीय का कार्य आत्मा को चारित्र से च्युत करना है आत्म-दृष्टि से च्युत करना उसका कार्य नहीं, क्‍योंकि न्याय से विचार करने पर इतर दृष्टियों के समान वह भी एक दृष्टि है ॥६९०॥ जिस प्रकार दैव-योग से यदि किसी की एक आँख निर्मल है तो यह प्रत्यक्ष से देखते हें कि दूसरी आंख में संताप के होने पर भी उसकी हानि नहीं होती । उसी प्रकार चारित्र-मोह के उदय से चारित्र-गुण में विकार के होने पर भी आत्मा के सम्यक्त्व गुण की हानि नहीं होती ॥६९१॥ जब तक कषायों का अनुदय है तभी तक चारित्र है और कषायों का उदय ही आत्मा का चारित्र से च्युत होना है ॥६९२॥ इसलिये चाहे कषायों का अनुदय हो चाहे उदय हो पर दर्शन-मोहनीय के उदय के बिना इतनेमात्र से सम्यग्दर्शन की कोई हानि नहीं होती ॥६९३॥ अन्तरंग कारण की अपेक्षा विचार करने पर आचार्य और उपाध्याय ये दोनों ही समान हैं, साधु हैं, साधु के समान आत्मज्ञ हैं, शुद्ध है और शुद्ध उपयोगवाले हैं ॥६९४॥ इन दोनों में परस्पर तरतमरूप कोई विशेषता नहीं है और न इन दोनों से साधु में भी अतिशयरूप से कोई भीतरी उत्कर्ष पाया जाता है ॥६९५॥ यदि इनमें परस्पर थोड़ी बहुत विशेषता है भी तो वह बाह्य-क्रिया कृत ही है क्योंकि इन तीनों का मूल कारण अन्तरंग शुद्धि जबकि समान है तो बाह्य विशेषता से क्या हानि है ? ॥६९६॥